कंडम वाहनों को ‘फेंकता’ रहा निगम, समय पर नीलामी करते तो लाखों का घाटा न होता
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल।
वित्तीय मामलों में नगर निगम की ओर से की गई गड़बड़ी के एक के बाद एक मामले सामने आ रहे हैं। कभी टेंपरेरी एडवांस के नाम पर करोड़ों देना और उसका अभी तक बिल या ब्यौरा न मिलना तो कभी एक करोड़ का लोन लेकर उसे ‘भूल’ जाना, नतीजन दो करोड़ से ज्यादा की ब्याज के रूप में चपत। अब एक और मामला नगर निगम के वाहनों से जुड़ा है। लापरवाही का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि निगम के लाखों के वाहन कंडम होते रहे तो उन्हें एक प्लाट में ‘फेंकते’ रहे। साल 2009 से अब तक कई साल बीत जाने के बाद भी निगम को कंडम वाहन याद नहीं आए, आज ये लाखों रुपये के वाहन ‘मिट्टी’ हो रहे हैं। निगम के अधिकारियों को आज तक कंडम वाहनों को बेचने तक का समय नहीं मिला, इससे निगम को सीधे तौर पर लाखों रुपये का नुकसान हुआ है। अगर समय पर इनकी नीलामी होती को यह लाखों का नुकसान बच जाता।
बता दें कि नगर निगम में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रयोग के लिए वाहन हैं। नियमों के अनुसार, जब वे कंडम घोषित कर दिए जाते हैं तो निगम द्वारा उन वाहनों को ताऊ देवीलाल चौक के पास निगम की पड़ी जमीन में रखा जाता है। अब तक निगम के 21 वाहन यहां पर कंडम पड़े हैं। इनमें कार, जीप, ट्रैक्टर, ट्राली समेत रोलर तक शामिल हैं। पिछले कई साल से ये वाहन यहीं पर पड़े हैं। आज स्थिति ये है कि खुले आसमान के नीचे पड़े होने के कारण इन वाहनों को जंग खा रहा है, जो अब लोहे से ‘मिट्टी’ में तब्दील होने लगे हैं। निगम के अधिकारियों की इस लापरवाही को हरियाणा लोकल आडिट की टीम ने गंभीरता से लिया है और इस बारे में तल्ख टिप्पणी भी की। रिपोर्ट में कहा गया है कि तुरंत प्रभाव से इन वाहनों की बोली कराकर इन्हें बेचा जाए और इन वाहनों की बोली कराने की जिम्मेदारी किसकी थी, उसकी जिम्मेदारी तय की जाए और जो नुकसान निगम को हुआ है, उससे रिकवरी की जाए।
कलेक्टर रेट था 11 हजार, जमीन दे दी 9 हजार के हिसाब से, वो नहीं मिल पाये
इसके साथ ही एक और लापरवाही का मामला है। यहां पर निगम अधिकारियों ने कलेक्टर रेट से कम रेट पर बिजली निगम को जमीन दे दी, लेकिन निगम ने आज तक सस्ते रेट पर ली गई जमीन के हिसाब से भी पैसे नहीं दिये हैं, जो अब 1.36 करोड़ रुपये हो गए हैं। मामले के अनुसार, गांव घोघड़ीपुर के पास बिजली निगम को सब स्टेशन स्थापित करने के लिए 1500 गज जमीन चाहिए थी, जो निगम के पास थी। दोनों में जमीन देने को लेकर सहमति हो गई। वर्ष 2009 में जमीन का कलेक्टर रेट 11 हजार रुपये था, लेकिन यह जमीन 9 हजार रुपये के हिसाब से दी गई, लेकिन आज तक निगम यह राशि भी नहीं ले पाया है। अब ब्याज समेत यह राशि 1 करोड़, 36 लाख रुपये हो गई है। जबकि म्यूनिसिपल एक्ट के तहत निगम अपनी जमीन किसी को भी निशुल्क नहीं दे सकती, अगर जमीन ट्रांसफर करनी है तो उसको कलेक्टर रेट के हिसाब से ही दिया जा सकता है।
प्राइवेट कंपनी को दे दिये पांच करोड़, वापस लेने का समय नहीं
नगर निगम ने दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी को भी टेंपरेरी एडवांस के तौर पर पांच करोड़ रुपये थमा दिये। लेकिन आज तक कंपनी ने न तो पांच करोड़ रुपये खर्च करने के बिल थमाये और न ही उसका स्टेटस ब्यौरा। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2009 में तत्कालीन निकाय कमेटी ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को चलाने वाली दिल्ली की एक फर्म को अधिकारियों द्वारा टेंपरेरी एडवांस के नाम पर पांच करोड़ रुपये अलग-अलग तारीखों में दिए गए। आंकड़े बताते हैं कि 30 अप्रैल 2012 को 1 करोड़ रुपये, 5 फरवरी 2013 को 2 करोड़ रुपये दिये गए। इसी प्रकार 20 सितंबर, 2013 को 2 करोड़ रुपये दे दिये गए। चार साल बीत जाने के बाद भी कंपनी ने न तो इस पैसे को खर्च करने के बिल दिये और न ही निगम को कोई ब्यौरा। अब स्थिति ये है कि यह कंपनी प्लांट को छोड़कर भी जा चुकी है। ये सीधा सा निगम को राजस्व नुकसान है।
जल्द कराएंगे बोली : ईओ
इस बारे में नगर निगम के कार्यकारी अधिकारी धीरज कुमार ने बताया कि कंडम वाहनों को चेक कराया जाएगा और जल्द ही उनकी बोली कराई जाएगी। वाहनों की बोली समय पर क्यों नहीं की गई इसकी जांच कराई जाएगी और जो भी जिम्मेदार होगा, उससे जवाब तलब किया जाएगा। कंपनी को पांच करोड़ रुपये टेंपरेरी एडवांस के रूप में देने के बारे में फाइल देखे बिना कुछ नहीं कहा जा सकता।