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चार माह से मेडिकल कॉलेज में आई ऑटोमेटिक एनालाइजर बायोकेमेस्ट्री मशीन, नहीं हो पाया एक भी टेस्ट

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चार माह से मेडिकल कॉलेज में आई ऑटोमेटिक एनालाइजर बायोकेमेस्ट्री मशीन, नहीं हो पाया एक भी टेस्ट
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-केमिकल नहीं होने की वजह से बंद पड़ी है मशीन
-मेडिकल कॉलेज में लैब टेक्निशियनों की भारी कमी, मरीज होते हैं परेशान
फोटो संख्या-
अमर उजाला ब्यूरो
करनाल। सीएम सिटी में साढ़े छह सौ करोड़ रुपये की लागत से बने कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज में सुविधाओं की बजाए मरीजों को परेशानियों का ज्यादा सामना करना पड़ता है। मरीजों के ब्लड टेस्ट को जल्दी से जल्दी करने के लिए करीब चार माह पूर्व मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा करोड़ों रुपये खर्च करके फूली ऑटोमेटिक एनालाइजर बायोकेमिस्ट्री ब्लड टेस्ट मशीन को मंगवाया गया था। मशीन को इंस्टाल भी किया जा चुका है, लेकिन इंस्टाल हो जाने के चार माह बाद भी मशीन से एक भी टेस्ट नहीं हो पाया है। फिलहाल मेडिकल कॉलेज में मशीन के रेजेंट नहीं आए है , जिनके इंतजार में यह करोड़ों रुपये की मशीन बंद पड़ी हुई है। मशीन न चलने से मरीजों को काफी दिक्कतें आ रही हैं। मेडिकल कॉलेज में औसतन 3500 की ओपीडी होती है, जिनमें से प्रतिदिन डॉक्टरों द्वारा करीब 1250 मरीजों के ब्लड टेस्ट करवाए जाते हैं। जबकि इनमें से कॉलेज की बायोकेमिस्ट्री लैब में 250 के करीब मरीजों के ही टेस्ट हो पाते हैं। ऐसे में करीब 1000 मरीजों को बिना टेस्ट के ही वापस लौटना पड़ता है या फिर उन्हें वेटिंग में लगा दिया जाता है। समय पर टेस्ट न होने से इलाज में देरी होने से बीमारी ओर ज्यादा बढ़ जाती है। कुछ मरीज परेशान होकर प्राइवेट लैबों से मंहगे रेटों पर बाहर से टेस्ट करवा लेते हैं। वहीं मेनुअली ब्लड टेस्ट करने के लिए स्टाफ की कमी होने के कारण 3 दिन बाद टेस्टों की रिपोर्ट मरीजों को दी जाती है। मशीन शुरू हो जाए तो मरीजों को अगले दिन ही रिपोर्ट मिल सकती है और उनका समय पर इलाज हो सकता है, लेकिन कॉलेज प्रबंधन की अनदेखी के कारण करोड़ों रुपये की एनालाइजर मशीन पिछले चार माह से बंद पड़ी हुई है।
मशीन एक साथ करती है 25 टेस्ट
फुली ऑटोमेटिक एनालाइजर बायोकैमिस्ट्री मशीन एक साथ 25 के करीब टेस्ट कर देती है। मशीन द्वारा एक सेंपल से शुगर, लिपिड, यूरिक एसिड जैसे 25 टेस्ट संभव है। वहीं मशीन यह सभी टेस्ट कुछ मिनटों में कर सकती है। जबकि मोजूदा स्थिति में इस टेस्ट करने में कई घंटे का समय लग जाता है। अगर मशीन चालू हो जाए तो मरीजों को इसका बहुत फायदा हो सकता है। मशीन चालू होने के बाद मरीजों को अगले दिन ही रिपोर्ट मिलनी शुरू हो जाएगी। लेकिन रेजेंट न आने की वजह से मशीन पिछले 4 माह से बंद पड़ी है।
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12 बजे बंद कर देते सेंपल लेने से मना
मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने ब्लड के सेंपल के लिए सुबह 8 बजे से लेकर 12 बजे तक का समय निर्धारित किया है। 12 बजे के बाद अगर कोई भी मरीज सेंपल देने के लिए आता है तो स्टाफ के सदस्य उसे साफ मना कर देते हैं। सुबह 8 बजे ओपीडी खुलती है, मरीज अक्सर लेट ही आते हैं। इसके बाद टॉकन के लिए लाइन, फिर पर्ची के लिए लाइन और उसके बाद डॉक्टर के कमरे के बाहर लाइने लगी होती है। मरीजों को चैकअप करवाने के लिए 12 बज जाना कोई बड़ी बात नहीं है। डॉक्टर मरीजों के टेस्ट लिख देते हैं। जब वह टेस्ट के लिए सेंपल देने के लिए पहुंचते हैं तो इतने में सेंपल कॉलेक्शन खिड़की बंद हो जाती है।
स्टाफ कम होने से तीसरे दिन मिलती है रिपोर्ट
मेडिकल कॉलेज में स्टाफ की भारी कमी है। कॉलेज में 22 लैब टेक्निसियन कार्यरत है। जबकि मरीजों की संख्या देखते हुए यहां 22 ओर लैब टेक्निसियनो की जरूरत है। इसी तरह 33 टेक्निसियन असिस्टेंट की आवश्यकता है, यह पद खाली हैं। स्टाफ की कमी के चलते मरीजों को ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट समय पर नहीं मिल पा रही है। मरीज लाइनों में धक्के खाने के बाद टेस्ट के लिए ब्लड सेंपल तो दे देते हैं। लेकिन ब्लड जांच की रिपोर्ट तीन दिन बाद मिलती है।कॉलेज प्रबंधन बतौर नोटिस चसपाकर यह जानकारी दे रहा है कि रिपोर्ट तीन दिन बाद मिलेगी। स्टाफ की कमी के बाद भी हालात कुछ ठीक होने की संभावना है।
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ऑटोमेटिक एनालाइजर बायोकैमेस्ट्री मशीन को चलाने के लिए कैमिकल की आवश्यकता होती है। सरकार को उन कैमिकल के लिए लिखा गया है। सरकार द्वारा केमिकल सेंक्शन नहीं किए गए। जब तक कैमिकल नहीं आएंगे, तब तक मशीन नहीं चल पाएगी। केमिकल आते ही मशीन को चालू कर दिया जाएगा। स्टाफ की कमी भी जल्द पूरी हो जाएगी।
-डॉ. सुरेंद्र कश्यप, डायरेक्टर, कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज करनाल
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