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विश्व पृथ्वी दिवस

Fri, 22 Apr 2016 12:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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विश्व पृथ्वी दिवस - फोटो : ब्यूरो
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कैथल। आज विश्व पृथ्वी दिवस है। जिसमें हम पृथ्वी को बचाने का संकल्प लेते हैं। केवल संकल्प लेना ही पर्याप्त नहीं होगा। धरती को बचाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने होंगे। जिले में लगभग दो दशक से एक ही फसल चक्र, अंधाधुंध कीटनाशक एवं जरूरत से ज्यादा यूरिया के प्रयोग ने धरती की सेहत को खराब कर दिया है। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो हमारी हरी भरी उपजाऊ धरती बंजर हो जाएगी। जमीनी स्तर पर राष्ट्रीय सायल हेल्थ कार्ड जैसी योजनाएं अभी दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
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मिट्टी-पानी जांच के लिए लैब एक सहायक के भरोसे:-
जिले भर में   करीब 1 लाख 98 हजार हेक्टेयर में मिट्टी की जांच के लिए कृषि विभाग के पास केवल एक ही लैब है। जिसमें तकनीकी स्टाफ के नाम पर महज एक सहायक नियुक्त है। जिसे सैंपल लेकर उनकी जांच के बाद रिपोर्ट तैयार करने सहित सायल हेल्थ कार्ड तैयार करने का काम करना होता है। ना ही इस लैब में आवश्यक उपकरण हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच की कोई सुविधा नहीं है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमीनी स्तर पर सरकार मिट्टी के स्वास्थ्य को लेकर कितना चिंतित है। इस लैब के अलावा कृषि विज्ञान केंद्र में एक लैब है। वहां भी सूक्ष्म तत्वों की जांच की सुविधा नहीं है।

अभी तक 200 के सायल हेल्थ कार्ड बनें:-
पिछले साल शुरू की गई सायल हेल्थ कार्ड योजना के तहत अभी तक केवल 200 किसानों के सायल हेल्थ कार्ड बने हैं। जबकि पूरे जिले से 14000 से अधिक सैंपल लिए गए हैं। इनमें से 1100 सैंपलों को सूक्ष्म जांच के लिए अंबाला भेजा गया है। इसके अलावा कृषि विभाग के अधिकारियों एवं किसानों द्वारा स्वयं इस लैब से 2400 रिपोर्ट कार्ड अलग से तैयार किए हैं। इस लैब में शोरा, सोडियम बाइकार्बोनेट एवं क्लोराइड व मैग्रिशियम की जांच होती है। वहीं कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा करीब 800 किसानों को जांच रिपोर्ट दी गई है।
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4:2:1 के मुकाबले 24:2:1 है एनपीके का अनुपात:-
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा औसतन 4:2:1 को सही माना जाता है। लेकिन जिले में यह 24:2:1 है। जिससे स्थिति की भयावता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके अलावा जांच रिपोर्ट के परिणाम अनुसार यहां की मिट्टी में फास्फोरस व जिंक की भारी कमी है। शोरा ज्यादा होने के कारण मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है। बरसात व नहरी पानी के अभाव में यह समस्या ओर विकट हो जाती है।
चार से पांच गुणा ज्यादा डालते हैं किसान यूरिया, अंधाधुंध हो रहा है कीटनाशकों का प्रयोग:-
किसान यूरिया एवं कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। विशेषज्ञों से सलाह लेकर किसानों को जरूरत अनुसार डालने के लिए कई बार आह्वान किया जाता है, लेकिन किसान जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन का प्रयोग कर अपनी ही मिट्टी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

धारा 144 के बावजूद लगाई जा रही है फानों में आग:-
किसान प्रशासनिक रोक के बावजूद गेहूं व धान के अवशेषों को जलाते हैं। जिस कारण मिट्टी के पोषक तत्व भी जलकर राख हो रहे हैं। गेहूं के इस सीजन में भी सरकार द्वारा फाने जलाने पर धारा 144 के तहत कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं। लेकिन इन आदेशों का उल्लंघन कर किसान कई जगह फाने जला रहे हैं।

किसानों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही जरूरत अनुसार यूरिया डालना चाहिए। विभाग के कृषि विकास अधिकारियों के माध्यम से इस बारे में किसानों को जागरूक किया जाता है।
डा. महावीर सिंह, कृषि उप-निदेशक

लैब में ऑर्गेनिक कार्बोनेट सहित सोडिया बाईकार्बोनेट की जांच होती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच के लिए अंबाला सैंपल भेजे जाते हैं। जिले भर में इस साल करीब 2500 से अधिक किसानों को जांच रिपोर्ट सौंपी जा चुकी है। 200 के सायल हेल्थ कार्ड बनाए गए हैं।
सूरजभान, सहायक मिट्टी पानी जांच केंद्र, कैथल।

किसानों को जानकारी लेकर धरती की जरूरत अनुसार खादों व दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। रासायनिक खादों व दवाओं की बजाए ऑर्गेनिक खादों का प्रयोग भी किया जा सकता है।
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ईश्वर कुंडू, किसान वैज्ञानिक।
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