स्वास्थ्य विभाग बिना हथियार डेंगू से लड़ रहा है। विभाग के पास ना तो पर्याप्त स्टाफ है और न ही संसाधन। फोगिंग का कार्य भी केवल डेंगू प्रभावित इलाकों तक सीमित रह गया है। ऐसे में लोगों को डेंगू के प्रकोप का सामना करना पड़ रहा है।
जिले में अभी तक 47 लोगों में डेंगू की पुष्टि हो चुकी है। शनिवार एवं रविवार को अवकाश के चलते नए टेस्ट नहीं हो पाए। निजी अस्पतालों में डेंगू के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। शाह अस्पताल में शनिवार को भी डेंगू के 4 मरीज भर्ती किए गए हैं। इसके अलावा पूरे जिले से 130 से ज्यादा लोगों के सेंपल लिए जा चुके हैं।
60 की एवज में महज 6 कर्मचारी
मलेरिया विभाग में मच्छरों पर नियंत्रण के लिए कैथल शहर में कम से कम 10 और पूरे जिले में 10 अन्य टीमों की आवश्यकता है। इन टीमों में 3 कर्मचारी प्रत्येक में शामिल होता है। मशीन चलाने एवं उसमें दवा डालने के लिए कम से कम तीन कर्मचारी चाहिए। इस हिसाब से पूरे जिले में 60 कर्मचारियों की तो फील्ड में आवश्यकता है। लेकिन इस समय पूरे जिले में केवल दो टीमें हैं। इनमें केवल छह कर्मचारी हैं। मलेरिया कार्यालय में भी एक इन्सेक्ट कलैक्टर, एक बायोलॉजिस्ट एवं एक स्टोर कीपर चाहिए। लेकिन तीनों पद खाली पड़े हैं।
केवल दो मशीनों से चलाया जा रहा काम
फोगिंग के लिए महज 4 मशीनें हैं। इनमें से दो खराब पड़ी हैं। ऐसे में दो ठीक मशीनों से ही काम चलाया जा रहा है। दो मशीनों में से यदि एक में खराबी भी आ गई तो पूरा जिला एक फोगिंग मशीन के भरोसे रह जाएगा।
केवल डेंगू प्रभावित इलाके के लिए मिल रही दवाएं
विभागीय सूत्रों ने बताया कि पूरे जिले में फोगिंग की बजाए केवल उन जगहों, कॉलोनियों में ही फोगिंग हो रही है। जहां डेंगू के केस पॉजीटिव पाए जाते हैं। जबकि सीजन से पहले एक बार यदि पूरे जिले में फोगिंग हो जाए तो मच्छरों पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
जांच के लिए नहीं मशीन
जिला अस्पताल में डेेंगू के लिए केवल एलीजा टेस्ट करने की सुविधा है। ज्यादा गंभीर हालत होने की स्थिति में प्लेटलेट्स को अलग करने के लिए एक सेल्फ सिपारेटर मशीन की आवश्यकता होती है। जो महज दो से तीन लाख रुपये मेें आ जाती है। जरूरत पड़ने पर उसे पंचकुला या हिसार से मंगवाना पड़ता है। मशीन के नहीं होने से मरीजों को रैफर करना पड़ता है।
महंगे इलाज के कारण लुट रहे मरीज
सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए सभी तरह के संसाधनों के अभाव में मरीजों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। यहां सामान्य डेंगू होने पर भी आठ से दस हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यदि प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ जाए तो यह खर्च बढ़कर 30 से 40 हजार रुपये तक भी हो जाता है।
जहां-जहां डेंगू के मरीज मिल रहे हैं, उन एरिया में फोगिंग का शेड्यूल बना दिया गया है। जितने भी संसाधन हैं, उन्हीं के अनुसार डेंगू से निपटने का प्रयास किया जा रहा है। दवाओं की कोई कमी नहीं है। डेंगू पाए जाने वाले स्थानों पर फोगिंग कराई जाती है। इस अभियान में जनता का भी सहयोग चाहिए। लोगों को भी चाहिए कि वे घरों में पानी खड़ा नहीं होने दें, जिससे डेंगू का लारवा नहीं पनप सके।
आरके पूनिया, सीएमओ, कैथल