कैथल। दांत निकालने या अन्य डेंटल सर्जरी से पहले मरीज की ट्रिपल एच यानी एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी जांच कई मामलों में इलाज का अहम हिस्सा बन गई है। जिला नागरिक अस्पताल में रोजाना होने वाली डेंटल सर्जरी के मामलों में जरूरत के अनुसार 15 से 20 मरीजों की यह जांच कराई जाती है, ताकि रक्त जनित जानलेवा संक्रमण के खतरे को कम किया जा सके।
अस्पताल के डेंटल विभाग में प्रतिदिन करीब 100 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं। इनमें अधिकांश मरीज दांत दर्द, मसूड़ों की समस्या और दांतों में कीड़े की शिकायत लेकर आते हैं। वहीं 20 से 30 मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें दांत निकालने, गहरी सफाई (स्केलिंग) या अन्य सर्जिकल प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है। डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, पेशा, पहले की जांच रिपोर्ट और प्रस्तावित उपचार को देखते हुए तय करते हैं कि ट्रिपल एच जांच की जरूरत है या नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी रक्त के माध्यम से फैलने वाले संक्रमण हैं। दांतों की कुछ सर्जिकल प्रक्रियाओं में रक्तस्राव होने की संभावना रहती है। ऐसे में मरीज में संक्रमण होने की स्थिति में डॉक्टर अतिरिक्त सावधानी और निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाते हैं। कई बार जांच के दौरान ऐसे मरीज भी सामने आते हैं, जिन्हें स्वयं अपने संक्रमण की जानकारी नहीं होती।
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इलाज करवाते समय इन चीजों का ध्यान जरूर रखें
संक्रमण नियंत्रण में उपकरणों का सही तरीके से स्टरलाइजेशन काफी महत्वपूर्ण है। सरकारी अस्पतालों में इसके लिए ऑटोक्लेव मशीन का उपयोग किया जाता है, जो निर्धारित तापमान और दबाव पर उपकरणों को जीवाणुरहित करती है। वहीं कुछ छोटे निजी डेंटल क्लीनिकों में कम लागत के कारण स्टीम बॉयलर आधारित स्टरलाइजेशन प्रणाली का उपयोग किया जाता है, क्योंकि ये सस्ती पड़ती है। हालांकि विशेषज्ञ ऑटोक्लेव को अधिक प्रभावी और मानक तकनीक मानते हैं। साथ ही ऑटोक्लेव से स्टरलाइज्ड यंत्रों से भी 100 प्रतिशत संक्रमण रुक जाए ये जरूरी नहीं है और इसी खतरे को देखते हुए ट्रिपल एच जांच करवाई जाती है। इलाज करवाते समय मरीजों को इन चीजों का भी ध्यान रखना चाहिए।
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महंगे इलाज से समय बच रहा लेकिन ये दे सकता है संक्रमण
निजी दांतों के अस्पतालों में ट्रिपल एच जैसी जांच को तव्वजो नहीं दी जाती है, क्योंकि मरीज जल्दी में होता है और वो समय ज्यादा न लगे, इसलिए निजी अस्पताल में पहुंचता है। ऐसे में निजी अस्पताल भी ट्रिपल एच जांच करवाए बिना ही इलाज को तव्वजो देते हैं, क्योंकि निजी लैब में ट्रिपल एच जांच कराने पर सामान्यत: 1000 से 1500 रुपये तक का खर्च आता है और रिपोर्ट में भी लगभग 24 घंटे या इससे ज्यादा समय लग जाता है। वहीं सरकारी में ये जांच मुफ्त है लेकिन यहां रिपोर्ट 24 से 48 घंटे बाद ही मिल पाती है।
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ट्रिपल एच जांच अब जरूरी : डॉ. अनिल रंगा
प्रत्येक मरीज की ट्रिपल एच जांच नहीं कराई जाती। केवल उन्हीं मामलों में जांच कराई जाती है, जहां सर्जरी के दौरान रक्तस्राव की संभावना अधिक हो या मरीज की हिस्ट्री के आधार पर इसकी आवश्यकता महसूस हो। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान कई बार ऐसे मरीजों में भी संक्रमण की पुष्टि हुई है, जिन्हें पहले इसकी जानकारी नहीं थी। समय पर जांच होने से मरीज का उपचार तय करने के साथ-साथ संक्रमण के प्रसार को रोकने में भी मदद मिलती है। मरीजों में इतनी जागरूकता होना जरूरी है कि वे निजी या सरकारी कहीं भी इलाज करवाएं लेकिन इन चीजों के बारे में जरूर पता कर लें।
- डॉ. अनिल रंगा, वरिष्ठ डेंटल सर्जन, जिला नागरिक अस्पताल, कैथल।
मरीज के दांतों की सफाई करते वरिष्ठ डेंटल सर्जन डॉ. अनिल रंगा। संवाद