बाता स्वास्थ्य केंद्र में जर्जर हुआ भवन।
कैथल। अस्पताल वह जगह होती है जहां बीमार को नया जीवन मिलता है, लेकिन महकमे का अपना सिस्टम ही इस वक्त वेंटिलेटर पर नजर आ रहा है। कहीं विभाग किराए की इमारतों के सहारे सांसें ले रहा है, तो कहीं जर्जर हो चुके खंडहरों में मरीजों की जान दांव पर लगाकर इलाज किया जा रहा है। ढांड, अरनौली, बढ़सीकरी और सजुमा जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों पर विभाग के पास अपनी छत तक नहीं है। यहां स्वास्थ्य केंद्र किराए के भवनों में चल रहे हैं। इन किराए की इमारतों में न तो पर्याप्त जगह है और न ही आधुनिक चिकित्सा उपकरणों को रखने की सुविधा। तंग जगह और छोटे कमरों में चलने वाले इन केंद्रों के कारण मरीजों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। जिले में 22 पीएचसी व 6 सीएचसी, 145 सब-सेंटर हैं।
जर्जर भवनों में बीमार सिस्टम
इससे भी भयावह स्थिति उन गांवों की है जहां सरकारी इमारतें तो हैं, लेकिन वे रहने लायक नहीं बचीं। बाता, बालू और जखौली जैसे क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों के भवन जर्जर हो चुके हैं। बाता में इमारतों की छतें दरक रही हैं और दीवारों से सीमेंट झड़ रहा है। बारिश के मौसम में तो छतों से पानी टपकना आम बात है। हैरानी की बात यह है कि इन्हीं जर्जर दीवारों के नीचे न केवल डॉक्टर बैठते हैं, बल्कि मजबूरी में मरीज भी इलाज के लिए आते हैं। जहां महिलाओं की डिलीवरी होती है, वह कमरा 24 घंटे छत से पानी टपकता रहता है।
प्रशासन की अनदेखी से बीमार हुआ सिस्टम
स्वास्थ्य विभाग की इस बदहाली पर स्थानीय लोगों में भारी रोष है। बाता गांव के सरपंच प्रतिनिधि नरेंद्र कुमार समेत अन्य ग्रामीणों का आरोप है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद उच्च अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। नई इमारतों के प्रस्ताव फाइलों में दबे पड़े हैं। जब सिस्टम का अपना ढांचा ही खंडहर हो चुका हो, तो वह जनता को स्वस्थ रखने की गारंटी कैसे दे सकता है? डॉक्टरों और स्टाफ के लिए भी ऐसी जगहों पर काम करना किसी चुनौती से कम नहीं है, जहां बिजली की वायरिंग से लेकर शौचालय तक की स्थिति दयनीय है।
इस बारे में मुख्यालय में पत्र लिखा गया है। सजुमा में स्वास्थ्य केंद्र भवन बनने के लिए बजट स्वीकृत हो चुका है। इसकी आगामी प्रक्रिया जारी है। अन्य भवनों के लिए भी स्वीकृति मिलते ही प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
- डॉ. रेनू चावला, सिविल सर्जन, कैथल