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महारास लीला से ही हुआ था जीवात्मा का परमात्मा से मिलन : कृष्णानंद

Tue, 19 Aug 2025 01:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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19 कलायत: श्रीमद्भागवत के छठे दिन की कथा सुनाते आचार्य भरत भारद्वाज
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संवाद न्यूज एजेंसी
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कलायत। श्री कपिल मुनि मंदिर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन कथा व्यास भरत भारद्वाज ने गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग, महारास लीला, रासलीला में भगवान शंकर का आना एवं श्री कृष्ण रुक्मणी विवाह के प्रसंग का सुंदर वर्णन किया। कथा में आचार्य ने रास पंच अध्याय का वर्णन करते हुए कहा कि महारास में पांच अध्याय हैं। उनमें गाए जाने वाले पंच गीत भागवत के पंच प्राण हैं। जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है वह भव पार हो जाता है।

उन्हें वृंदावन की भक्ति सहज प्राप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि महारास में भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया और महारास लीला द्वारा ही जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हुआ। श्रीमद्भागवत कथा के महत्व को बताते हुए कथा व्यास ने कहा कि जो भक्त प्रेमी कृष्ण-रुक्मणी के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं उनकी वैवाहिक समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। कथा वाचक ने कहा कि जीव परमात्मा का अंश है। इसलिए जीव के अंदर अपार शक्ति रहती है।
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संकल्प एवं कपट रहित होने से प्रभु उसे निश्चित रूप से पूरा करेंगे। गोपी गीत पर बोलते हुए कथा व्यास ने कहा जब-जब जीव में अभिमान आता है भगवान उनसे दूर हो जाते हैं। जब कोई भगवान को न पाकर विरह में होता है तो श्रीकृष्ण उस पर अनुग्रह करते है उसे दर्शन देते है। भगवान श्रीकृष्ण के विवाह प्रसंग को सुनाते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का प्रथम विवाह विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मणि के साथ संपन्न हुआ।
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भगवान शंकर का रासलीला में शामिल होने का विस्तार से वर्णन किया। भगवान की अनेक लीलाओं में श्रेष्ठतम लीला रास लीला का वर्णन करते हुए बताया कि रास तो जीव का शिव के मिलन की कथा है। यह काम को बढ़ाने की नहीं काम पर विजय प्राप्त करने की कथा है। इस कथा में कामदेव ने भगवान पर खुले मैदान में अपने पूर्व सामर्ध्य के साथ आक्रमण किया लेकिन वह भगवान को पराजित नहीं कर पाया, उसे ही परास्त होना पडा। रासलीला में जीव का शंका करना या काम को देखना ही पाप है। मथुरा गमन प्रसंग में अक्रूर जी भगवान को लेने आए। जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा जाने लगे समस्त ब्रज की गोपियां भगवान कृष्ण के रथ के आगे खड़ी हो गई। कहने लगी हे कन्हैया जब आपको हमें छोड़कर ही जाना था तो हम से प्रेम क्यों किया। श्री कृष्ण एवं रुकमणी विवाह उत्सव पर पंडाल में खूब बधाइयां दी गईं।

19 कलायत: श्रीमद्भागवत के छठे दिन की कथा सुनाते आचार्य भरत भारद्वाज

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