शहर के स्कूलों में अध्यापकों का टोटा है जिस कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। वीरवार को विद्यार्थियों नेे सीएम विंडो में शिकायत देकर अध्यापकों की नियुक्ति की गुहार लगाई। जानकारी के अनुसार कई स्कूलों में साइंस विषय के अध्यापक नहीं हैं जिसका खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। कई बच्चों ने सरकारी स्कूलों से अपने नाम कटवा लिए हैं और कई ट्यूशन के सहारे हैं।
सीएम को भेजी शिकायत में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के ग्यारहवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों ने बताया कि तीन-चार साल से उनके विद्यालय में साइंस विषय के अध्यापक नहीं हैं। जिस कारण उन्हें महंगी ट्यूशन लेकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। अध्यापकों की नियुक्ति के लिए वे अधिकारियों से लेकर नेताओं तक से गुहार लगा चुके हैं। स्कूल में सिलेबस पूरा नहीं हो पाता। मध्यम वर्गीय परिवारों से होने के कारण अधिकतर बच्चे ट्यूशन फीस भी नहीं दे सकते जिस कारण उनका भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।
स्कूल की छात्रा प्रियंका, विमल, रिंकी, किरण, मंजू, नीशु, उषा, मोनिका, नेहा, उषा, सुमन, ऋतु, सोनम ने बताया कि वे सुबह स्कूल में आती हैं केवल अंग्रेजी और हिंदी के दो पीरियड ही लगते है। केमिस्ट्री, फिजिक्स, बायो, गणित के अध्यापक न होने के कारण पूरा दिन खाली बैठकर घर चली जाती हैं।
कई विद्यार्थियों ने छोड़ा स्कूल
शहर के बड़े तीन स्कूलों में अध्यापक न होने कारण लगातार विद्यार्थियों की कमी होती जा रही है। विद्यार्थी अध्यापक न होने के कारण स्कूल छोड़ कर निजी स्कूलों में मजबूरन दाखिला ले रहे हैं। आंकड़े इस बात के गवाह हैं।
वर्ष, 2011 में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में मेडिकल व नॉन मेडिकल 1500 विद्यार्थी थे। तभी से केमिस्ट्री, फिजिक्स व गणित के अध्यापकों की कमी हुई। वर्ष ,2012 में संख्या घटकर 900 विद्यार्थी की रह गई। वर्ष, 2013 में विद्यार्थियों की संख्या 650 के करीब रही और वर्ष 2014 में 400 रही, वहीं 2015 में विद्यार्थियों की संख्या 200 तक आ चुकी है।
राजकीय कन्या स्कूल में वर्ष, 2011 में मेडिकल व नॉन मेडिकल के विद्यार्थियों की संख्या 600 से अधिक थी, वहीं 2015 में छात्राओं की संख्या घटकर अब 50 के करीब रह चुकी है।
माइक लगाकर पढ़ाते थे
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्रिंसिपल सतीश कुमार कक्कड़ ने बताया कि वर्ष, 2010 में मेडिकल व नॉन मेडिकल की कक्षाओं में 1500 के करीब विद्यार्थी थे। वे केमिस्ट्री की कक्षा लेते थे। विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण वे माइक लगाकर विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। अब अध्यापक न होने के कारण विद्यार्थी नहीं आ रहे हैं। विद्यार्थियों की संख्या प्रतिवर्ष कम होती जा रही है।
मेरे पास राजकीय स्कूल के विद्यार्थी अध्यापकों की मांग को लेकर आए थे। उनकी मांग को अधिकारियों को भेज दिया जाएगा। सरकार ने नए अध्यापकों के लिए पांच वर्ष की पॉलिसी बनाई है। जिसके तहत अध्यापकों को गांव में पढ़ाना पड़ता है। जिस कारण साइंस विषय के कई अध्यापक इस समय ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ा रहे हैं। यह नीतिगत समस्या है।
उपजिला शिक्षा अधिकारी, शमशेर सिंह सिरोही।