संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कई हिस्सों में मनाया जाने वाला लोहड़ी पर्व अब केवल आग जलाने और मूंगफली–रेवड़ी बांटने तक सीमित होता जा रहा है। कभी लोकगीतों, बोलियों, सामूहिक नृत्य और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक रहा यह पर्व समय के साथ अपना पारंपरिक स्वरूप खोता नजर आ रहा है। लोहड़ी से जुड़े पारंपरिक गीतों और बोलियों की जगह डीजे की तेज धुनों ने ले ली है, जिससे लोक संस्कृति धीरे-धीरे हाशिये पर जाती दिखाई दे रही है।
कुछ दशक पहले तक गांवों में लोहड़ी का माहौल बिल्कुल अलग होता था। शाम ढलते ही महिलाएं टोलियां बनाकर घर-घर जाती थीं। वे पारंपरिक लोकगीत गातीं और जिन घरों में संतान का जन्म हुआ हो या नई शादी हुई हो, वहां विशेष गीत गूंजते थे। “सुंदर मुंदरिए हो...” जैसे गीत हर गली में सुनाई देते थे। लोहड़ी की आग के चारों ओर बैठकर बुजुर्ग किस्से-कहानियां सुनाते, बच्चे तालियां बजाते और पूरा गांव एक परिवार की तरह त्योहार मनाता था।
तलाई बाजार निवासी 65 वर्षीय सरबजीत कौर बताती हैं कि पहले लोहड़ी आने से कई हफ्ते पहले ही महिलाएं गीत याद करने लगती थीं। हर उम्र की महिलाएं साथ चलती थीं और पूरा गांव इसमें शामिल होता था। आज की युवतियों को लोकगीत गाने नहीं आते, क्योंकि नई पीढ़ी मोबाइल और डीजे की धुनों में उलझ गई है। माता गेट निवासी 75 वर्षीय विमला देवी का कहना है कि अब केवल शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवों में भी लोहड़ी डीजे के बिना अधूरी मानी जाती है। इससे न सिर्फ पारंपरिक गीत गायब हो रहे हैं, बल्कि लोगों के बीच आपसी संवाद और सामूहिकता भी कम होती जा रही है। वहीं छात्र अमनदीप सिंह का मानना है कि डीजे पर ज्यादा आनंद आता है। दोस्तों के साथ नाचने और मस्ती करने का मौका मिलता है। उनके अनुसार पुराने गीत आज की पीढ़ी को उतने रोमांचक नहीं लगते। त्योहार ऐसे मौके होते हैं, जब युवा डीजे की धुन पर खुशी के पल तलाशते हैं।
चंदाना गेट निवासी रामपाल शर्मा कहते हैं कि लोकगीत किसी भी समाज का इतिहास होते हैं। लोहड़ी के गीत खेती, ऋतुओं, परिवार और जीवन संघर्ष से जुड़े होते थे। इन गीतों के लुप्त होने से हमारी सांस्कृतिक जड़ें कमजोर होंगी। उन्होंने कहा कि जरूरत है कि हम फिर से लोहड़ी जैसे पर्वों पर लोकगीतों की ओर लौटें।