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Kaithal News: आढ़तियों और मिलरों के आगे प्रशासन बेबस

Tue, 14 Oct 2025 02:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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13kht_24_मंडी में पुराने कांटों से धान की तुलाई करते हुए मजदूर।
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संवाद न्यूज एजेंसी
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गुहला-चीका। धान खरीद सीजन आधे से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन अनाज मंडियों में अब भी पुराने कांटों से तौलाई जारी है। सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद प्रशासन डिजिटल कांटों को लागू कराने में नाकाम रहा है। स्थिति यह है कि आढ़ती और राइस मिलर अधिकारियों की आंखों के सामने नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, जबकि किसान अपने हक के लिए बेबस नजर आ रहे हैं।

सरकार ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि मंडियों में केवल डिजिटल कांटों से ही फसल की तौलाई की जाएगी ताकि पारदर्शिता बनी रहे, लेकिन अधिकांश मंडियों में पुराने कांटे ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं। आढ़ती और राइस मिलर इन पुराने कांटों से धान की बोरियों में 200 से 300 ग्राम तक अतिरिक्त धान भर रहे हैं, जिससे किसानों को सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है। नाराज किसानों का यह भी कहना है कि कुछ आढ़तियों ने केवल दिखावे के लिए अपनी दुकानों में डिजिटल कांटे रखे हैं, लेकिन वास्तविक तौलाई पुराने कांटों पर ही होती है। अगर कोई किसान डिजिटल कांटे पर तौलाई की मांग करता है तो आढ़ती बहानेबाजी कर मुकर जाता है।
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भाकियू (चढूनी) के प्रदेश उपाध्यक्ष चमकौर बनेंडा, जिला उपाध्यक्ष केवल सदहरेड़ी, हरजिंदर नंबरदार और लखविंदर सिंह ने आरोप लगाया कि आढ़ती और राइस मिलर मार्केट कमेटी सचिवों, डीएफएससी, हैफेड और स्टेट वेयरहाउस के अधिकारियों की मिलीभगत से किसानों को लूट रहे हैं। उनका कहना है कि पहले नमी के नाम पर धान के भाव से 500 से 700 रुपये प्रति क्विंटल तक की कटौती की जाती है।

अधिकारियों की शह पर मंडियों में गड़बड़ी हो रही है। किसानों की शिकायतें कोई नहीं सुन रहा। मार्केट कमेटी सचिव और जिला प्रशासन कार्यालयों में बैठे हैं और किसान मंडी में परेशान हैं। मंत्री या मुख्यमंत्री ने मंडियों का दौरा नहीं किया। किसानों को लूटा जा रहा है, और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। -विक्रम कसाना, युवा प्रदेशाध्यक्ष, भाकियू चढ़ूनी
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किसानों से मंडी में धान सरकारी रेट पर नहीं खरीदी जा रही। धान 1600 से 2200 रुपये प्रति

क्विंटल में बिक रही है। आढ़ती पहले किसानों को कच्ची पर्ची थमा देते हैं और बाद में सरकारी रेट दिखाने के लिए जे-फॉर्म काट देते हैं, जिससे किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता

है। -हरजिंदर नंबरदार, भाकियू

युवा नेता
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