अंबाला सिटी। हरियाणा स्टेट ट्रांसपोर्ट अपीलेट ट्रिब्यूनल (एसटीएटी) में जिला न्यायाधीश कंचन माही ने गुरुग्राम के क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण (आरटीए) द्वारा निजी बस संचालकों के रूट बदलने के आदेश को सिरे से खारिज कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम की धाराओं को ताक पर रखकर किया गया रूट परिवर्तन न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि जनहित के भी खिलाफ है। गुरुग्राम में सिटी बस सर्विस स्कीम- 2004 के तहत कुछ निजी संचालकों को दिल्ली बॉर्डर से धारूहेड़ा के रूट पर परमिट मिला था। इन संचालकों ने घाटे और सवारियों की कमी का हवाला देकर अपने रूट को गुरुग्राम बस स्टैंड से धारूहेड़ा (वाया इफ्को मेट्रो, आईएमटी मानेसर) में बदलने के लिए आवेदन किया था। आरटीए गुरुग्राम ने 6 नवंबर 2025 को इन संचालकों की अर्जी स्वीकार कर ली थी। ट्रिब्यूनल ने आरटीए गुरुग्राम के आदेश को अवैध और शून्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि उदार नीति का मतलब यह नहीं है कि मौजूदा नियमों की अनदेखी कर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अव्यवस्थित कर दिया जाए।
पुराने ऑपरेटरों ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
इस रूट पर पहले से बसें चला रहे संजीव और अन्य संचालकों ने इस फैसले को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। उनके वकील ने दलील दी कि जिस रूट पर नई बसें भेजी जा रही हैं, वह पहले से ही अत्यधिक व्यस्ततम है। रिपोर्ट के मुताबिक इस 40 किलोमीटर के रूट पर रोजाना 1000 से ज्यादा ट्रिप होते हैं, यानी हर एक मिनट में एक बस उपलब्ध है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
जिला न्यायाधीश कंचन माही की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए आरटीए के आदेश में गंभीर खामियां पाईं। मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार रूट में बदलाव 24 किलोमीटर से अधिक नहीं हो सकता, जबकि यहां पूरा 40 किमी का रूट ही बदल दिया गया। नियम कहते हैं कि रूट बदलने पर शुरुआती और आखिरी पॉइंट नहीं बदलने चाहिए, लेकिन इस मामले में इन्हें भी बदल दिया गया था। जांच में सामने आया कि रूट बदलने की मांग करने वाले कुछ संचालकों ने मोटर व्हीकल टैक्स और अड्डा फीस का बकाया भी जमा नहीं किया था।