संवाद न्यूज एजेंसी
कलायत। कलायत में सामूहिक तौर पर तीज का त्योहार पहली बार आयोजित किया गया। कपिल तीर्थ के किनारे बनाए गए पार्क में सामूहिक तौर पर झूला डाला गया। इसमें महिलाओं ने पारंपरिक कपड़े डाल तीज के गीत गाते हुए पींग झूली। इस मौके पर महिलाओं ने तीजों के गीत गाए और गुलगुले सुहालियों का आनंद लिया।
कार्यक्रम की सूत्रधार रहीं प्रियंका गौतम ने कहा कि कलायत में कोई सामूहिक स्थान न होने के कारण से झूले डलते ही नहीं थे। अब पार्क के बन जाने से इसमें वे लोग नियमित तौर पर योगाभ्यास करती हैं और सांझे कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। इसी कड़ी में परंपरागत तौर पर पींग डली महिलाएं झूला झूली और तीजों के गीत गाए। कविता ने कहा कि एक ऐसा समय भी था जब झूलों के बिना हरियाली तीज को अधूरा माना जाता था। आधुनिकता ने तीज के महत्व को कम कर दिया है।
उन्होंने कहा कि अब तीज एक त्योहार एक परंपरा नहीं बल्कि औपचारिकता बनकर रह गई है। सोनिया शर्मा ने कहा कि पहले के समय में नई ब्याही महिलाएं सावन के शुरुआत होते ही अपने मायके आ जाती थीं। अपनी सहेलियों के संग मिलकर सावन और तीज का त्योहार मनाती थीं। इसकी तैयारी एक महीने पहले ही शुरू हो जाती थी। नीम, बरगद या पीपल के पेड़ में झूला बांध कर उसे फूलों से सजा कर तैयार करती थीं। पर अब जैसे महिलाओं के पास परंपराओं के लिए समय ही नहीं रहा। सीमा, सुषमा, मनीषा ने कहा कि बहुत समय के बाद से कलायत में पारंपरिक ढंग से तीज का त्योहार मना कर उन लोगों को बहुत अच्छा लगा। तीजों के पारंपरिक गीत व भजन गाते हुए झूला झूलना और बाद में सामूहिक तौर पर गुलगुले व सुहालियां खाना सब मिल कर एक यादगार तीज का पर्व मना।