कैथल। चंदाना गेट स्थित प्राचीन श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर के कारण इस शहर को छोटी काशी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत युद्ध से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहां ग्यारह रुद्रों की स्थापना की थी और पांडवों से इनकी पूजा करवाई थी, जिससे युद्ध में मारे गए सैनिकों की आत्मा को शांति मिल सके। तभी से यहां भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है।
पौराणिक कथा और मान्यता
मंदिर के पुजारी पंडित मुनेंद्र मिश्रा के अनुसार, महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने कौरवों और पांडवों के बीच हुए भयंकर युद्ध के बाद सैनिकों की आत्मा की शांति के लिए ग्यारह रुद्रों की स्थापना की थी। इसके अलावा, मान्यता है कि अर्जुन ने महाभारत काल में पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति के लिए यहीं भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी।
भगवान शिव ने अर्जुन की आराधना से प्रसन्न होकर इसी स्थान पर उन्हें दर्शन दिए थे। तभी से यह स्थान शिव भक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया और पूरे देश से श्रद्धालु यहां आने लगे। जो भक्त महाशिवरात्रि पर भगवान शिव के ग्यारह रुद्रों पर जल अर्पित करता है, उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं और उसे हजार गायों के दान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। मंदिर में राम दरबार, माता दुर्गा, वैष्णो माता, राधा-कृष्ण, महाकाली, नवग्रह और राधे मंदिर स्थित हैं, जो श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं।
महाशिवरात्रि पर विशेष आयोजन
श्री ग्यारह रुद्री मंदिर समिति के प्रधान विनोद मित्तल के अनुसार, मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस बार महाशिवरात्रि पर मंदिर में शिव पुराण कथा का आयोजन 22 से 26 फरवरी तक किया जा रहा है, जिसमें वृंदावन से आई कथा वाचक पंडित दिव्या शिव पुराण कथा का मधुर वचनों में बखान कर रही हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर को रंगीन लाइटों से भव्य रूप से सजाया जाएगा।
विशेष श्रृंगार और रस्में
श्री ग्यारह रुद्र महादेव सेवादल द्वारा ग्यारह रुद्रों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इस बार महाशिवरात्रि पर रविवार हल्दी की रस्म की गई। सोमवार को मेंहदी की रस्म, 25 फरवरी का सेहराबंदी की रस्म होगी।
महर्षि कश्यप से जुड़ी कथा
मंदिर का इतिहास महर्षि कश्यप से भी जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार, महर्षि कश्यप ने भगवान शिव की तपस्या कर वरदान मांगा था कि भगवान शिव उनके पुत्र के रूप में जन्म लें। भगवान शिव ने गाय माता (सुरभि) के गर्भ से ग्यारह रूपों में जन्म लिया, इसलिए इन्हें सुरभि पुत्र भी कहा जाता है।
यह माना जाता है कि काशी के बाद केवल कैथल ही ऐसा स्थान है, जहां एक ही स्थान पर ग्यारह रुद्र विराजमान हैं।
ग्यारह रुद्रों के नाम
01-विलोहित
02-शास्ता
03-कपाली
04-पिंगल
05-अजपाद
06-अहिबरुघ्न्य
07-भीम
08-विरूपाक्ष
09-चंड
10-भव
11-शंभु
कैथल में स्थित यह श्री ग्यारह रुद्री शिव मंदिर अपनी ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है