कैथल। अधिक कीटनाशक के उपयोग के कारण यूरोपीय देशों में भारतीय उत्पादों पर लगे बैन पर अब सरकार की नींद टूटी है। इसी मद्देनजर मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के उपक्रम भारतीय बासमति निर्यात एवं विकास फाउंडेशन की ओर से कैथल के किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र में कार्यशाला का आयोजन किया गया।
गौरतलब है कि यूरोपीय और अन्य देशों ने भारतीय आम की अल्फांसो किस्म पर यह कहते हुए बैन लगा दिया था कि इसमें अधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया गया है और ये लोगों की सेहत के लिए हानिकारक है। क्योंकि कैथल हमारे देश की सबसे बड़ी बासमती मंडियों में से एक है और यहां बासमती का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। इसलिए अब सरकार किसानों को जागरूक करने के उद्देश्य सेमिनार और कार्यशालाओं का आयोजन करवा रही है, ताकि किसानों को दिक्कतें न आए।
वैज्ञानिकों की सलाह से डालें कीटनाशक : डॉ. वीपी सिंह
किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए देश-विदेश में बासमती बाजार पर कब्जा जमा चुकी 1121 किस्म के ब्रीडर पद्मश्री विजेता डा. वीपी सिंह ने किसानों को कीटनाशकों के बारे में जागरूक किया। डा. वीपी सिंह ने कहा कि धान की फसल में अंधाधुंध दवाओं का प्रयोग करने के बजाये वैज्ञानिकों की सलाह से दवाएं एवं खाद डालें।
धान की फसल में बालियां आने के बाद कोई भी कीटनाशक न डालें। क्योंकि इनका असर बाद में फसल पर रहता है। जो देश-विदेश में होने वाली जांच में आ जाता है। ऐसे में हानिकारक तत्व पाए जाने पर इसका निर्यात भी बैन हो सकता है। इसीलिए जरूरत अनुसार ही खाद एवं दवाओं का प्रयोग करना होगा। यह सेमिनार बासमती निर्यात विकास फाउंडेशन, राइस एक्सपोर्ट्स एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित था।
खेती में मशीनीकरण की जरूरत
हरियाणा कृषि विश्व विद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशक डा. एसएस सिवाच ने कहा कि आज कृषि के हर क्षेत्र में मशीनीकरण अपनाने की जरूरत है तथा कम खर्च में ज्यादा उत्पादन लेने की आवश्यकता है। चावल निर्यातक संघ के पूर्व ऑल इंडिया अध्यक्ष विजय सेतिया, ऋतु चोपड़ा, केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डा. हरि ओम, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सदस्य कुलदीप धारीवाल, कौल स्थित धान अनुसंधान केंद्र के सीनियर प्लांट पैथोलॉजिस्ट डा. राम सिंह, सीनियर कीट वैज्ञानिक डा. लक्खी राम ने भी किसानों को इस संबंध में जानकारी दी।
अमेरिका और ईरान में आई थीं दिक्कतें
बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान मोदी पुरम के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. ऋतेश शर्मा ने धान की विभिन्न किस्मों एवं बासमती निर्यात बढ़ाने के बारे में किसानों को अहम जानकारी दी। उन्होंने इस अवसर पर ‘अमर उजाला’ से बातचीत में कहा कि देश भर से बासमती के निर्यात के क्षेत्र में बेहतरी के उद्देश्य से बीईडएफ काम करता है।
अन्य फसलों की तर्ज पर कुछ क्षेत्र की बासमती में भी पिछले कुछ समय में कीटनाशकों से नुकसान की रिपोर्ट मिली हैं। अमेरिका और ईरान ने कुछ तत्वों को लेकर सवाल उठाए गए थे। अब स्थिति मुश्किल से काबू की गई है। इसी कारण पिछले साल बासमती की कीमत अच्छी रही। यदि किसी एक देश में बासमती पर प्रतिबंध लग जाता है तो यह चावल उद्योग के लिए मुसीबत पैदा करेगा।
इसी कारण किसानों को बासमती के उत्पादन में ही सावधानी रखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कैथल में अगस्त माह में फिर से जिलास्तरीय कार्यक्रम का आयोजन कर जागरूक किया जाएगा। गौरतलब है कि हमारे देश में सन 2012-13 में लगभग 19203 करोड़ रुपये का बासमती धान निर्यात किया। उन्होंने किसानों को बासमती धान के उत्पादन की सश्य क्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी भी दी।
कैथल में एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा में उत्पादन
कैथल जिले में लगभग एक लाख 65 हजार हेक्टेयर धान का उत्पादन होता है। इसमें 90 प्रतिशत इलाका बासमती की 1121, परंपरागत बासमती और पूसा-1509 जैसी किस्मों ने कवर कर लिया है। इस बार भी कैथल जिले में उगाई जाने वाली 1.65 लाख हेक्टेयर में 80 प्रतिशत में पूसा-1509 के उत्पादन का अनुमान है। जिसे विदेशों में हाथों-हाथ लिया जा रहा है। इस तरह से जिले की बड़ी आबादी के लिए यह बड़ी आय का स्रोत बनेगा। यदि किसानों ने गुणवत्ता के आधार पर इसका उत्पादन करते हैं तो निश्चित रूप से इस बार भी उनके मालामाल होने की पूरी संभावनाएं हैं।
बीस किसान सम्मानित
केंद्र के वैज्ञानिक डा. रमेश वर्मा ने बताया कि इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट काम करने वाले लगभग 20 किसानों को सम्मानित किया गया। इनमें राजेश खेड़ी, सुरेंद्र जाजनपुर, सुरेश छौत, मनीष महत्ता, अमरीक हजवाना, सुरेंद्र लांबाखेड़ी और प्रदीप राणा बात्ता शामिल हैं। कैथल किसान क्लब के प्रधान कुशल पाल सिरोही ने उपस्थित अतिथियों का आभार व्यक्त किया तथा बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों को एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित करने पर बधाई दी।