एक ओर तो बेटियों के प्रति जागरूकता के लिए रोडवेज ने बसों की टिकटों पर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का लोगो प्रकाशित किया है। वहीं दूसरी ओर उन्हीं बसों में बेटियों को हर रोज भारी परेशानियों के बीच अपने स्कूल-कॉलेजों का सफर तय करना पड़ता है। उनके साथ बसों में धक्का-मुक्की होती है। वहीं कई गांवों में लड़कियों के लिए बसें ही नहीं हैं। जिस कारण उन्हें कई किलोमीटर दूर तक पैदल चलकर बस स्टैंड पर पहुंचना पड़ता है। जिससे वे शाम के समय घर पहुंचने में कई बार लेट हो जाती हैं।
टिकटों पर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा
रोडवेज की टिकटों पर बेटी बचाओ-बेेटी पढ़ाओ अभियान का लोगो लगाया जा रहा है। जिसमें लोगों को बेटियों को पढ़ाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। लेकिन बेटियों को सुविधा देने में रोडवेज ही पीछे है। गांवों से स्कूल-कॉलेज में आने-जाने के लिए कोई सुविधा नहीं मिलती। जिन गांवों में रोडवेज की बसें आती-जाती हैं वहां भी बेटियों को विपरीत परिस्थितियों में सफर तय करना पड़ता है।
बसें समय पर नहीं आती
राजकीय महाविद्यालय में पढ़ने वाली नॉन मेडिकल की छात्र रिंकी ने बताया कि वह गांव सजूमा से जगदीशपुरा में राजकीय कॉलेज में पढ़ने आती है। गांव में बस के आने का समय सात बजे का है। इसलिए इंतजार में उन्हें सुबह करीब साढे़ छह बजे ही बस स्टैंड पर खड़ा होना पड़ता है। अगर गांव में बसों के रूट को बढ़ा दिया जाए तो छात्राओं को कोई परेशानी नहीं होगी। उसके बावजूद भी बस समय पर नहीं आती।
शाम के समय होती है लेट
छात्रा सोनू ने बताया कि वह भी सजूमा गांव से ही आरकेएसडी कॉलेज में शिक्षा ग्रहण करने आती है। करीब 100 से भी अधिक लड़कियां कैथल व आस पास के क्षेत्रों में पढ़ने के लिए आती हैं। बस के आने का समय दोपहर तीन बजे का है। लेकिन इस समय बस का टाइम टेबल बिल्कुल बिगड़ चुका है। यह कभी तो चार बजे आती है और कभी इससे भी अधिक लेट। एक तरफ तो सरकार बेटियों के उत्थान के लिए अभियान चलाकर अनेक दावे करती है लेकिन दूसरी और स्कूल व कॉलेज में शिक्षा ग्रहण करने वाली छात्राओं को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
बस पास होने के बावजूद होती है परेशानी
गांव सेरहधा से राजकीय कॉलेज में पढ़ने वाली बीटीएम की छात्रा आंचल ने बताया कि वह कैथल से 30 किलोमीटर दूर स्थित गांव सेरधा से आती है। पहले तो बसों में धक्का मुक्की के कारण कैथल पहुंचने में परेशानी होती है। दूसरा कैथल से कॉलेज तक जाने में भी बस न मिलने के कारण अधिक समय लग जाता है। पहले तो रोडवेज ने कुछ दिन लड़कियों के लिए स्पेशल बस चलाई थी लेकिन अब वह भी बंद कर दी है। जबकि पास के लिए विभाग ने पूरे रुपये ले रखे हैं।
धरातल पर नहीं हो रहा अभियान पर कार्य
करोड़ा से आने वाली और आईजी कॉलेज में बीकॉम में पढ़ने वाली छात्रा सोनिया ने बताया कि सरकार द्वारा हर क्षेत्र में बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ नारा दिया जा रहा है। लेकिन यह अभियान धरातल पर सही तरीके से लागू नहीं हुआ है। सरकार को धरातल पर जाकर इस अभियान की पड़ताल करनी चाहिए। जिससे यह अभियान सफल हो सके।
तीन महीने में करीब एक करोड़ टिकटों पर लगती है मुहर
रोडवेज के टीएसआर मांगे राम शर्मा ने बताया कि टिकटों पर जनवरी 2016 से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की मुहर लगाने का कार्य शुरू हुआ है। हर तीन माह में करीब एक करोड़ बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की मुहर लगी टिकटें विभाग द्वारा दी जाती है।
वहीं रोडवेज जीएम रामकुमार का कहना है कि चीका-कैथल, कुरुक्षेत्र-कैथल व पूंडरी वाया पाई, रोहेड़ा बाकल होते हुए एक राजकीय बस चल रही है। अभी गांवों में बेटियों के लिए निशुल्क बस चलाए जाने जैसा कोई आदेश नहीं आया है। बेटियों को बस पास सहित तमाम कार्यों में प्रयास किया जाता है कि कोई परेशानी ना हो। टिकटों पर बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत मुहर जागरूकता के लिए लगाई जा रही है।