जिले में पिछले चार साल पहले ग्रामीण क्षेत्र में 1 लाख 53 हजार घरों में शौचालय नहीं थे। यहां 2012 से 2016 तक 1 लाख 11 हजार 219 शौचालय बना दिए गए। इसके बावजूद खुले में शौचमुक्ति के मामले में कैथल पिछड़े जिलों में शुमार है। यहां करीब 13 प्रतिशत इलाका ही खुले में शौचमुक्त है। यदि इतनी बड़ी संख्या में शौचालय बन चुके हैं तो यह प्रतिशत काफी कम है। या तो लोगों को शौचालय में शौच जाने की आदत नहीं है, या फिर ये शौचालय कागजों में बने हैं। मामले की जांच हो तो बड़ा खुलासा हो सकता है।
2012 के सर्वे में मिले थे 1 लाख 53 हजार पात्र परिवार
सरकार ने वर्ष 2012 में सर्वे किया था, जिसमें ग्रामीण एरिया में एक लाख 53 हजार परिवार ऐसे पाए गए थे, जो शौचालय बनाने के पात्र थे। इन घरों में शौचालय नहीं थे। इन घरों में शौचालय बनाने के लिए जोर-शोर से अभियान भी चला। केंद्र व राज्य सरकारों से करोड़ों रुपये की राशि भी जारी हुई। शौचालय भी बने, लेकिन जमीनी स्थिति काफी चिंताजनक है।
खुले में शौच से महज 13 प्रतिशत गांव मुक्त
वर्ष 2012 के बाद जिले में इस वर्ष तक करीब 1 लाख 11 हजार से अधिक घरों में शौचालय भी बना दिए गए। इस तरह से करीब 60 से 70 प्रतिशत शौचालयों की जरूरत को पूरा कर दिया गया। जिसके चलते खुले में शौचमुक्त अभियान सफल हो जाना चाहिए था और इसमें काफी प्रगति होनी चाहिए थी। लेकिन खुले में शौच मुक्त के मामले में जिले मेें महज 13 प्रतिशत एरिया रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। जो काफी चिंताजनक है। इस क्षेत्र में जिला प्रदेश के अधिकतर पिछड़े जिलों में शुमार है। जबकि दो जिले पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। कैथल में यह लक्ष्य अभी दूर की कौड़ी नजर आ रहा है।
करीब 18 से 20 करोड़ हो चुका है खर्च
केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2000 से लेकर 2013-14 तक करीब 11.66 करोड़ रुपये की राशि इस मद में जारी की गई। इसके अलावा केंद्र व राज्य सरकार द्वारा करीब 7.5 करोड़ रुपये की राशि पिछले चार सालों में शौचालयों पर खर्च की गई है।
खुले में शौचमुक्ति के नाम पर हो रहा है फर्जीवाड़ा
ग्रीन कैथल, क्लीन कैथल अभियान के संयोजक पुनीत चौधरी एडवोकेट ने कहा कि सरकार द्वारा करोड़ों रुपया खर्च करने के बावजूद जिले का एक भी गांव शत-प्रतिशत खुले में शौच से मुक्त नहीं है। जिन गांवों को अवार्ड दिया जा रहा है, उन गांवों में लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं। शौचालय कहां बनाए गए, कब बनाए गए? इनकी जांच होनी चाहिए।
शौचालय बनाना एवं खुले में शौचमुक्त होना दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। कई लोग शौचालय होने के बावजूद खुले में शौच के लिए जाते हैं। जिस कारण यह लक्ष्य काफी कम है। लेकिन अब इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सामाजिक रूप से प्रयास करने शुरू कर दिए गए हैं। सरकार ने शौचालय के लिए पैसा देना बंद कर दिया है। लोगों को खुद के शौचालय बनाने के लिए प्रेरित कर पूरे जिले को शौचमुक्त किया जाएगा। जो पंचायत खुले में शौचमुक्त होगी, उसे एक लाख रुपये का नकद इनाम भी दिया जा रहा है। इसी तरह कई प्रोत्साहित करने वाली योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनका असर होगा।
शक्ति सिंह, एडीसी, कैथल।