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नहीं रुक रहा प्रसव में शिशु-माता की मौत का सिलसिला

Thu, 29 Oct 2015 12:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला कैथ्ाल
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लगातार संस्थागत प्रसूती को बढ़ावा देेने के बावजूद जिले में प्रसव के दौरान मां और शिशु दोनों की मौत का सिलसिला जारी है। पिछले वर्ष के मुकाबले  इस वर्ष मातृ व शिशु मृत्यु दर में गिरावट दर्ज की गई है। कमी आने के बावजूद  गर्भवती महिलाओं व शिशुओं को मिलने वाली सुविधाओं  में सुधार देखने को नहीं मिला है।
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यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रत्येक मृत्यु पर विशेष विचार विमर्श किया जाता है। उधर, फील्ड स्तर पर जागरूकता की कमी, जिला अस्पताल में लगातार बढ़ रहा मरीजों का बोझ एवं स्वयं गर्भ के दौरान माता के स्वास्थ्य के प्रति लोगों की लापरवाही को मुख्य कारण माना जा रहा है।  इनमें सुधार की सभी योजनाएं दम तोड़ती नजर आ रही हैं।

पिछले वर्ष जनवरी से दिसंबर 2014 तक जिले में 31 महिलाओं ने बच्चे को जन्म देत हुए मौत हो गई थी। इस वर्ष के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो अक्तूबर महीने तक 19 माताओं की प्रसव के  मौत हो चुकी हैं। ऐसा तब है कि जब गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं सरकार ने शुरू की हुई है।
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रेड कार्ड से लेकर कई अन्य योजनाएं इस समय चल रही है। जिनके अंर्तगत गर्भवती महिलाओं का डाटा सरकारी अस्पतालों में दर्ज किया जाता है। इसके बावजूद 19 महिलाओं की मौत होना चौकानें वाली बात है।

जन्म के बाद शिशू की भी हो रही हैं मौतें
 शिशु मृत्यु दर में भी इस साल कमी देखने को मिली है। पिछले साल जिले में 952 बच्चों ने जन्म के दौरान या सप्ताह भर बाद दम तोड़ दिया था। परंतु इस साल अक्टूबर माह तक 581 बच्चे दम तोड़ चुके हैं। इनमें खास बात यह है कि जन्म के दौरान ही 406 बच्चों की मौत हो चुकी है जो चिंता का विषय है।

जबकि 357 बच्चों की 7 दिनों के भीतर-भीतर मौत हुई है। 71बच्चों  ने 28 दिनों में, 153 ने 29 से 35 दिनों में दम तोड़ा। वहीं 66 बच्चों की मृत्यु एक वर्ष से पांच  की उम्र में हुई है। जानकारी के अनुसार  इस वर्ष अब तक 14 हजार 196 बच्चे पैदा हो चुके हैं।

यह मुख्य कारण मौत के
1. गर्भ के दौरान माताओं के स्वास्थ्य को लेकर लोगों द्वारा लापरवाही बरती जा रही है। 90 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी पाई गई है। जो प्रसव के दौरान सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आती है।

2.  फील्ड स्तर पर एएनएम एवं जीएनएम सहित आशा वर्कर्स द्वारा सही रिपोर्टिंग ना करना भी इसका मुख्य कारण है। हाई रिस्क प्रेग्रेंसी में माता के स्वास्थ्य को लेकर सजग होकर जानकारी दी जानी होती है, लेकिन इस क्षेत्र में विभाग का काम संतोषजनक नहीं है। समय से बीपी सहित खून की कमी का पता चल जाए तो इसे पूरा किया जा सकता है।

3. 100 बैड के अस्पताल में हर समय 200 मरीज दाखिल रहते हैं। लेकिन स्टॉफ की कमी रहती है। कई बार ज्यादा मरीजों की संख्या भी इस तरह की घटना का कारण बन रहा है।

4. प्रसव के तुरंत बाद लोग माताओं को घर ले जाने का प्रयास करते हैं। जबकि 48 घंटे तक माताओं को अस्पताल में रखना होता है। यह एक मुख्य कारण माना जाता है।  विभाग द्वारा महिलाओं को दाखिल रहने के समय पूरी डाइट दी जाती है। इसके अलावा दूसरे बच्चे के बीच तीन साल का अंतर नहीं रहता। समय पर महिलाओं की स्वास्थ्य जांच नहीं होती।

 किसी भी माता एवं शिशु की मौत होना बड़े दु:ख का विषय है। इसे नियंत्रित किया जा रहा है। पहली इस संबंध में पूरी जानकारी नहीं मिल पाती थी। अब रिपोर्टिंग सिस्टम में सुधार किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए गंभीरता से प्रयास किए जा रहे हैं। फील्ड स्तर पर सही रिपोर्टिंग, हाई रिस्क प्रेग्रेंसी पर नजर रखने, माताओं के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता, शिशु एवं माता मृत्यु के 25 प्रतिशत मामलों पर अलग से मीटिंग करके कारण खोजने से लेकर लोगों को 48 घंटे तक अस्पताल में माता को दाखिल रखने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
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डॉ. वंदना भाटिया, सीएमओ
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