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साहित्यकारों ने किया मां को नमन

Sun, 11 May 2014 11:52 PM IST
कैथल
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आरकेएसडी कॉलेज में रविवार को सहित्य सभा की ओर मासिक समीक्षा गोष्टी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता पीआर बांबा तथा मंच संचालन ईश्वर गर्ग ने किया। '
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गोष्ठी में जिलेभर से आए अनेक सहित्यकार व कवियों ने मां को लेकर रचनाएं प्रस्तुत कीं। गोष्ठी का आगाज करते हुए कवि रामफल गौड़ ने हरियाणवी अंदाज में मिट्टी की महिमा के बखान में कहा, ‘माटी मरै, मिले माटी मैं, कितना अजब नजारा सै, बीच मैं माटी, अंत मै माटी, कौन से न्यारा माटी तै...।’ अनिल गर्ग ने मां की ममता को कुछ यूं दर्शाया, ‘कर्ज मां का कोई चुका नहीं सकता, इसके बिना इस दुनिया में कोई आ नहीं सकता...।’ डा. प्रद्युमन भल्ला ने दोहे में कहा, ‘मां ममता की पोटली, मां खुशियों की खान, जिस घर में आदर मां का वह स्वर्ग समान...।’

रविन्द्र कुमार रवि ने अपनी शायरी प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘हर चौक बाजार हो गए, हम एक दूसरे के खरीददार हो गए, पहचान में कोई आता नहीं, इक आदमी के सैकड़ाें किरदार हो गए...’। मां को भगवान का दूसरा रूप देते हुए कमलेश शर्मा ने कविता में कहा, ‘मैंने जब भी देखा है, तुझे व्यस्त देखा है, बचपन में सोचा करता मां सोती कब है?’ राजकुमारी मदान ने बताया मां मेरे लिए तो हर दिन ही मातृ दिवस है। सरोज जोशी ने मां शब्द का अर्थ में कहा, मां शब्द एक संस्कृति, अनुभूति, मां असीम श्रद्धा, प्रेम व त्याग की मूर्ति है। सतपाल शस्त्री ने कहा, ‘इंसान ते पैदा होंण तै, इंसान बणै कोनी, बिन हिम्मत तै तेरी पछाण कौनी...।’
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डा. चतुरभुज बंसल ने हरियाणवी दोहे को प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘माड़े करतब खुद करे सै, दैवे राम नै दोष, सारा दिन व धुत रहै पड़या रै से बेहोश...।’ मतदाताओं के जागरूकता के लिए डा. ओमप्रकाश बंसल ने कहा, ‘ताकत मिल गई, अब कुछ तो बना, कुछ अपना बना कुछ खुद का बना...’। शायर बेजार ने कहा, लुत्फ होता अगर तुम न होते तो गुजर जाती सारी उम्र रोते रोेते, फिजा भीगी भीगी, ये मौसम सुहाना, कुछ बातों में इतना ही अंतर बतलाते हैं, कुछ दिल में गुजर जाते हैं, कुछ दिल में उतर जाते हैं...।’
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अमृत लाल मदान ने धरती मां पर दोहे को प्रस्तुत करते हुए कहा, आ मां तुझे गले लगा लूं, बच्चों को नित पोसने नित अथक रही हो तुम...।’ गुलशन मदान ने कहा, ‘सांस की हरेक कड़ी मंहगी पड़ी, रोज की ये खुदकुशी मंहगी पड़ी, आपसे यूं बिछड़े तो तनहा हुए लम्हा लम्हा जिंदगी मंहगी पड़ी...।’
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