संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। जिले में किसानों ने इस बार पराली जलाने के बजाय उसका बड़े पैमाने पर प्रबंधन कर मिसाल पेश की है। कृषि विभाग के अनुसार, जिले में लगभग साढ़े चार लाख एकड़ में से करीब 10 लाख मीट्रिक टन फसल अवशेष निकल रहा था, जिसमें से साढ़े नौ लाख मीट्रिक टन का प्रबंधन कर लिया गया है।
पहले ही चरण में साढ़े छह लाख मीट्रिक टन एक्स-सी-टू और ढाई लाख मीट्रिक टन इन-सीटू माध्यम से प्रबंधित किया गया। इसके अलावा 50 हजार मीट्रिक टन पशुओं के चारे के रूप में उपयोग हुआ और 50 हजार मीट्रिक टन किसानों ने अपने स्तर पर स्टॉक कर लिया है। अब केवल 50 हजार मीट्रिक टन शेष है, जिसका प्रबंधन इस सप्ताह पूरा कर लिया जाएगा।
कृषि विभाग ने किसानों को अनुदान पर 4 हजार से अधिक मशीनें उपलब्ध करवाई हैं, जबकि 742 कर्मचारी फील्ड में लगातार किसानों को पराली प्रबंधन के लिए जागरूक कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि पराली न जलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, डीएपी खाद की जरूरत कम पड़ती है और गेहूं की फसल का फुटाव बेहतर होता है।
हरसेक एप पर 11 जगह आग लगने की घटनाओं की पुष्टि : जिले में किसानों की जागरूकता के चलते पराली जलाने के मामलों में भारी कमी आई है। हरसेक
एप पर अब तक 59 लोकेशन की सूचना प्राप्त हुई, जिनमें से सिर्फ 11 स्थानों पर ही आग जलाने की पुष्टि हुई। इन मामलों में 50 हजार रुपये से अधिक जुर्माना
लगाया गया और 10 किसानों पर मामले दर्ज किए गए हैं।
पिछले साल की तुलना में स्थिति काफी बेहतर है। पिछले सीजन में 194 जगह आग जलाने की घटनाएं हुई थीं, 168 मामलों में पुष्टि हुई थी, 1.50 लाख रुपये जुर्माना लगाया गया था, 50 किसानों की गिरफ्तारी तथा 140 एफआईआर दर्ज की गई थीं। रविवार को जिले में एक भी आग लगाने की घटना नहीं हुई, जबकि अन्य जिलों में 50 स्थानों पर मामले आए।
1200 एकड़ अनुदान पर मिलने से घटनाओं में कमी
किठाना के किसान राजेंद्र ने बताया कि इस बार सरकार की ओर से 1200 एकड़ क्षेत्र में अनुदान पर मशीनें उपलब्ध करवाई गईं, जिससे आग लगाने की घटनाओं में स्पष्ट कमी आई है। किसानों को समय पर कृषि यंत्र उपलब्ध होने से पराली प्रबंधन सुचारू रहा।
जिले में इन धान किस्मों की रोपाई
कैथल को धान का कटोरा कहा जाता है और यहां का चावल विदेशों में भी प्रसिद्ध है। इस सीजन में किसानों ने मुख्यतः पीआर किस्म, उसके बाद 1121, 1885 और बासमती की रोपाई की। बासमती धान की कटाई देर से होती है, इसलिए उसके फसल अवशेषों का प्रबंधन अभी जारी है।
हरसेक ऐप से अब तक 59 लोकेशन की सूचना मिली, जिनमें 10-11 स्थानों पर आग जलाने की पुष्टि हुई है। पराली जलाने से भूमि की उर्वरता कम होती है, वायु प्रदूषण बढ़ता है और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बढ़ते हैं। -जगदीश चंद्र मलिक- सहायक अभियंता, कृषि विभाग,