अनाज मंडियों में धान की आवक शुरू हो गई है। लेकिन जिस तरह से धान की शुरुआती कीमत मिल रही है, उससे सीजन में बड़े मंदे की आहट का एहसास है।
इससे किसानों एवं मिलर्स सहित आढ़तियों में चिंता बढ़ गई है। पिछले सीजन में धान की फसल में कीमतें उससे पहले के सीजन की तुलना में काफी कम रही थीं। उसी मंदी का नतीजा है कि इस बार भी कीमतें उठने का आसार नजर नहीं आ रहा।
अनाज मंडी में इस समय राजस्थान, सिरसा सहित कैथल से पी आर ग्रुप की धान की आवक शुरू हो गई है। वहीं नॉन बासमती ग्रुप में शामिल 1509 की भी आवक शुरू हो गई है।
किसी समय 3000 रुपये प्रति क्विंटल बिक चुकी यह किस्म अब 1300 से 1400 रुपये प्रति क्विंटल तक ही बिक रही है। जिसे व्यापारी ही खरीद रहे हैं। ऐसे में सीजन में भी इसकी कीमतों में बढ़ौतरी होने के कम आसार हैं। 90 दिन में तैयार हो जाने वाली धान की 1509 किस्म को निर्यात की जाने वाली किस्मों में भी शामिल किया जाता है। जिस कारण काफी एरिया में कैथल में इसकी रोपाई की गई है। लेकिन जो कीमत मिल रही है, उससे किसानों का खर्च भी पूरा मुश्किल ही हो पाएगा।
दो से तीन हजार बोरियों की बावक
इस समय धान की 1509 की 2 से 3 हजार बोरियों की आवक मंडी में हो रही है। जिसके लिए 1400 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा के ग्राहक नहीं है। किसान भी मजबूरन अपनी फसल को इस कीमत पर बेचकर मायूस होकर लौट रहे हैं।
किसान रामस्वरुप, मियां सिंह, खुशी राम ने बताया कि यह सरकार की नीतियों का परिणाम है। पिछले सीजन में धान की कम कीमत मिली। गेहूं में प्रकृति की मार पड़ी। इस सीजन में फिर कीमतें अच्छी मिलने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में लगातार दो सालों का नुकसान किसान कैसे सहेगा। कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है।
चीनी उद्योग की तर्ज पर पैकेज की दरकरार
राइस मिलर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के प्रधान मांगे राम खुरानिया का कहना है कि सरकार की नीतियों के कारण चावल उद्योग लगातार घाटे में चल रहा है। पिछले सीजन में धान के सीजन में काफी कम कीमतें रहीं थीं। इस बार भी कीमतें आधी से भी कम हैं। जिससे किसानों, आढ़तियों एवं मिलर्स को भारी नुकसान होगा। सरकार को चाहिए कि चावल उद्योग को भी चीनी की तर्ज पर राहत पैकेज दिया जाए। साथ ही मिलिंग के 50 साल से भी पुराने नियमों में बदलाव किया जाए।