निशीकांत शर्मा
कलायत। कहते हैं कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल जरूर मिलती है। कलायत के राज मिस्त्री रवींद्र
धीमान की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है, जिन्होंने खुद पढ़ाई अधूरी रहने के बावजूद अपने बच्चों को ऊंची उड़ान दी।
रवींद्र धीमान ने पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते छठी कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और राज मिस्त्री का काम शुरू कर दिया। कम उम्र में ही शादी और फिर तीन बच्चों की जिम्मेदारी के बीच भी उन्होंने एक सपना संजोए रखा—अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देना। इस सफर में उनकी पत्नी ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया।
बच्चों ने पूरा किया पिता का सपना : रवींद्र के जीवन में बदलाव तब आया जब उनके भतीजे का चयन नेवी में हुआ। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने का संकल्प लिया। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।
उनकी मेहनत रंग लाई—बड़ा बेटा अंकुर भारतीय वायुसेना में सेवारत है, जबकि छोटा बेटा अमन नेवी में उच्च पद पर कार्य कर रहा है। बेटी राखी ने तो दोनों भाइयों से एक कदम आगे बढ़ते हुए हरियाणा पुलिस में डीएसपी बनकर परिवार का नाम रोशन किया।
रवींद्र धीमान कहते हैं कि भले ही वह खुद पढ़-लिखकर कुछ नहीं बन पाए, लेकिन अपने बच्चों को ऊंचे मुकाम पर देखकर उन्हें सुकून और गर्व महसूस होता है। यह कहानी बताती है कि मेहनत और संकल्प से पीढ़ियां बदल सकती हैं। संवाद