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गौपालकों की बेरुखी से कामधेनु लुप्तप्राय:

Sun, 08 Nov 2015 12:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला/कैथल
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देश में गौसंरक्षण पर मंथन हो रहा है वहीं प्रदेश की देसी गाय की नस्ल लुप्त होना चिंतनीय है। पूरे प्रदेश महज 5 से 6 हजार की संख्या में देसी गाय बची हैं। यह खुलासा लाला लाजपत राय पशु विश्वविद्यालय के रिसर्च में हुआ है। लुप्तप्राय: नस्ल को बचाने के लिए शोधकर्ता विश्वविद्यालय को विशेष प्रोजेक्ट सौंपा गया है। विश्वविद्यालय में विशेषज्ञों की टीम इस नस्ल के सांड़ का वीर्य संरक्षित कर इसे बचाने पर जुट गई है।
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देसी पर भारी अमेरिकन
रिसर्च के मुताबिक, हरियाणा में कई दशकों से किसान एवं पशुपालक विशेष रूप से मुर्राह नस्ल की भैंस पालते हैं। लेकिन अमेरिकन व दूसरी नस्ल आने के बाद वे अपनी देसी गायों को भूल गए। इस कारण इन गायों की संख्या लगातार घटती गई। आज शुद्घ हरियाणवी देसी गाय की नस्ल पूरे प्रदेश में 5 से 6 हजार पर सिमट गई है, जो इनके लुप्त होने की ओर इशारा कर रही है।


देसी गाय का दूध स्वास्थ्यवर्धक
देसी गाय के संरक्षण में जुटी टीम में शामिल डॉ. अंकित बताते हैं कि हरियाणा की देसी गाय प्रदेश की जलवायु के हिसाब से सबसे किफायती है। खास बात यह है कि यह नस्ल ए टू दूध देती है, जो भैंस एवं अन्य नस्लों की गायों के ए वन दूध से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होता है। दूसरा इसके पालन-पोषण पर ज्यादा खर्च नहीं आता। यह रिकॉर्ड 2 साल में गर्भित हो जाती है। तीसरा इस नस्ल में मौसमी बीमारी नहीं आती। इसके अलावा यह कम खर्च पर 15 से 17 लीटर दूध भी दे सकती है। एक ब्यांत में अच्छी नस्ल 2200 से 2500 लीटर तक दूध देती है।
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विशेष प्रोजेक्ट से नस्ल बचाने का प्रयास
लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं विज्ञान विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति मेजर जनरल श्रीकांत शर्मा के नेतृत्व में पशुपालन विभाग के एचओडी डॉ. बीएल पांडर, कैटल फार्म के इंचार्ज डॉ. बीएस मलिक ने बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया है। अच्छे सांड़ों का वीर्य संरक्षित कर किसानों को दिए जाएगा। प्रोजेक्ट पर डॉ. रविंद्र शर्मा के नेतृत्व में काम चल रहा है। इस टीम में शामिल डॉ. अंकित शर्मा ने कहा कि शुद्घ हरियाणवी देसी सांड़ का वीर्य गौपालकों व किसानों को देसी नस्ल बढ़ाने के लिए दिया जाएगा। यह गाय जिस भी पशुपालक के पास होगी, उसके लिए कामधेनु साबित होगी।
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