शहर के प्राचीन शनि कुंड का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। हालांकि यह कुंड प्राचीन काल में कैथल के ऐतिहासिक स्थलों में महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन वर्तमान में इस कुंड से जिले के लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हैं, इसी कारण से यह कुंड अनदेखी का शिकार हो रहा है।
इतिहासकारों के अनुसार महाभारत काल में कैथल में बनाए गए इस कुंड में पिछले कुछ वर्षों तक लोग स्नान के लिए आते थे, लेकिन अब बंद हो गए हैं। कुंड के साथ बनाए गए मंदिर में पूजा पाठ का कार्य अभी चल रहा है। मंदिर की देखरेख के लिए यहां पुजारी भी है और सुबह शाम पूजा पाठ किया जाता है।
कुरुक्षेत्र की 48 कोस परिधि में आता है शनि कुंड: कैथल में सिरटा रोड ईदगाह के पास बना यह कुंड कुरुक्षेत्र की 48 कोस परिधि में आता है। इतिहासकार डॉ. बीबी भारद्वाज बताते हैं कि इसका निर्माण महाभारत के युद्ध के बाद पांडव पुत्र युधिष्ठिर ने करवाया था। युद्ध में हुए रक्तपात और अपनों की मौत के बाद युधिष्ठिर के मन में आत्म गलानी आ गई थी। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें शहर में नौ कुंड बनाकर उनमें स्नान करने की सलाह दी थी। भगवान के कहे अनुसार उन्होंने कैथल में नवग्रह कुंडों की स्थापना की और पूजा-अर्चना कर उनमें स्नान किया। तभी से आसपास के लोग अपने मन की शुद्धि के लिए कुंड में स्नान करने लगे।
भाद्रपद माह के पहले शनिवार को जुटती थी श्रद्धालुओं की भीड़: आज से करीब 60 वर्ष पहले तक शनि कुंड में स्नान करने के लिए भाद्रपद माह के पहले शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती थी। यहां स्नान करने के बाद श्रद्धालु पूजा पाठ करते थे। कैथल के भाई शासकों ने इसे पक्का करवाया था और कुंड में स्नान करने के लिए सीढ़ियां बनवाई थी। कुछ वर्ष पहले प्रशासन की ओर से इसका जीर्णोद्धार भी करवाया गया था। कुंड में स्नान करने की परंपरा महाभारत काल से ही चला आ रही है।
प्राचीन स्थल को देखरेख की दरकार: महाभारत काल में बने इस कुंड को वर्तमान में देखरेख की दरकार है। कुंड में पहले 12 माह तक पानी भरा रहता था, अब वो समाप्त हो चुका है। इस कारण कुंड सूख गया है। सफाई का भी कोई प्रबंध नहीं है। देखरेख के अभाव में कुंड की दीवारों में पेड़-पौधे, घास और झाड़ियां उग गई हैं। कुंड के अंदर जाने वाले गेटों पर बदहाली फैली हुई है। आसपास की कॉलोनियों में रहने वाले लोगों ने कुंड की सफाई करवाने व इसमें पानी भरवाने की मांग की है।