निशीकांत शर्मा
कलायत। बिना बेहतर रखरखाव के कारण जर्जर हो रहा पंचरथ शैली का है शिवमंदिर की सुध लेने की जरूरत है। पुरातत्व विभाग ने इस स्मारक को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा देते हुए इसे 13 दिसंबर 1995 को संरक्षित धरोहर की घोषणा की थी।
पुरातत्व विभाग द्वारा लगाए गए शिलालेख के अनुसार पंचरथ शैली में निर्मित इस राष्ट्रीय धरोहर का निर्माण काल सातवीं शताब्दी का माना गया है। यह मंदिर प्रारंभिक शैली के गुर्जर प्रतिहार कला का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
इस धरोहर का संबंध भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान कपिल से है। माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान कपिल ने सांख्य शास्त्र की रचना कर अपनी मां देवहुति को ज्ञान दिया था।
एक अनुश्रुति अनुसार, राजा शालिवाहन को इसी स्थान पर चर्म रोग से मुक्ति मिली थी। इसी लिए उन्होंने एक ही रात्रि में पवित्र कपिल सरोवर के किनारे पर पांच शिवाले बनवाए थे। जिनमें से एक शिवालय मूल रूप से मौजूद है जिसे राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा मिला है।
भगवान शिव को समर्पित है यह राष्ट्रीय धरोहर ः भगवान शिव को समर्पित ईंटों से बना मंदिर प्राचीन वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए बहुत रुचिकर है। मंदिर के गर्भगृह में एक पत्थर का शिव लिंग है। पंचरथ शैली में निर्मित मंदिर चौकोर आकार का है।
शिखर पर सजावटी धनुषाकार अग्रभाग पर कई लघु चैत्य खिडक़ी थीम बनाई गई हैं। मंदिर में इस्तेमाल की गई ईंटों को बिना किसी गारे के फूलों और अन्य डिजाइनों के साथ खूबसूरती से उकेरा गया है।
इस समय यहां केवल दो मंदिर ही बचे हैं और बाकी तीन खंडहर हो चुके हैं। खंडहर हो चुके मंदिरों के अवशेष शानदार प्राचीन वास्तुकला दक्षता को दर्शाते हैं। माना जाता है कि प्रसिद्ध अजंता एलोरा मंदिरों के साथ तालमेल बिठाते हुए, ईंट के मंदिरों को विशेष रूप से नक्काशीदार ईंटों से बनाया गया था जिसमें वास्तुकला की सुंदरता को जोड़ा गया था।
पिछले 29 वर्षों से संभाल तो दूर बिगड़ी है धरोहर की हालत ः विश्व हिंदू परिषद जिला उपाध्यक्ष बीरभान निर्मल, प्रखंड अध्यक्ष संजय सिंगला, महामंत्री प्रियवर्त गालब, विशाल शांडिल्य, नरेश वर्मा, धनराज गर्ग आदि ने बताया कि इस मंदिर को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किए 29 वर्ष हो चुके हैं।
स्थानीय लोगों द्वारा उठाई जा रही मांग पर तवज्जो देते हुए पुरातत्व विभाग ने जनवरी 2022 में इस स्मारक की संभाल भी एकबार ली थी। पुरातत्व विभाग की कैमिकल विंग को शिवालय के साथ-साथ संबंधित परिसर की सफाई का जिम्मा सौंपा गया था। निर्धारित रूप रेखा के तहत टीम ने शिवालय सहित इसके पास की दीवारों व फर्श को केमिकल के लेप से चकाचक करना था।
प्रारंभिक चरण में दीवारों, शिवालय की ईंटों व फर्श की सफाई कर इस पर लगी मिट्टी व शैवाल को साफ किया गया। उसके बाद कार्य बंद हो गया जो आज तक बंद ही है। बीते सालों में इस धरोहर की संभाल पुरातत्व विभाग ने की ही नहीं। यह स्मारक लगातार जर्जर होकर गिरता रहा। इस धरोहर का राष्ट्रीय मानचित्र पर विवरण पढ़ कर श्रद्धालु इसे देखने के लिए आते हैं पर इसकी जर्जर हालात देख कर आस्था पर कुठाराघात ही होता है।
वर्ष 1970 में व्यापक स्तर पर हुआ था धरोहर जीर्णोद्धार कार्य ः कलायत में प्राचीन श्री कपिल मुनि तट पर हजारों वर्ष पूर्व पंचरथ शैली से निर्मित शिवालय की करीब तीन दशक से भारतीय पुरातत्व विभाग जिम्मेदारी संभाले है।
इससे पहले वर्ष 1970 में व्यापक स्तर पर धरोहरों का जीर्णोद्धार कार्य कलायत में शुरू हुआ था। उस दौरान सरोवर की खुदाई का कार्य भी हुआ। इसमें दुर्लभ कलाकृति, मूर्तियां और चौखट मिली थी। उस दौरान शिवालय भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में नहीं थे। श्री कपिल मुनि धाम पुजारी व क्षेत्र के लोगों द्वारा धरोहरों का संरक्षण किया जाता था। धरोहरों के महत्व को देखते हुए लोगों की मांग पर पंच रथ शैली से निर्मित शिव मंदिर और धरोहरों को विभाग ने अधिकृत किया था। संवाद