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भगवान सत, चित एवं आनंद हैं : साक्षी गोपाल

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श्रीमद् भागवत कथा के दौरान श्रद्धलु। स्वय
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कैथल। इस्कॉन समिति, कैथल की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर साक्षी गोपाल प्रभु ने बताया कि तब शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को सुनाते हैं कि किस प्रकार कंस का दुराचार बढ़ता ही जा रहा था। जब कंस ने देवकी के छह पुत्रों को मार दिया था उसके पश्चात आठवें पुत्र को भी मारना चाहता था लेकिन भगवान अपनी लीला से गोकुल चले गए। वह उन्हें मारने का निरंतर प्रयास करता रहा। जब उसने पूतना को भगवान का वध करने के लिए भेजा तो पूतना उसे समझाते हुए बोली कि किसी के बच्चे को उसके घर से उठाकर मारना इतना आसान कार्य नहीं है, जितना आप समझ रहें हैं। लेकिन महाराज! आप यह कार्य मुझे सौंप दें। कंस के पूछने पर पूतना ने बताया कि महाराज मेरे पास यौगिक सिद्धियां हैं। मैं अपनी इच्छा अनुसार कोई भी रूप धारण कर ब्रज गोप गोपियों के घर जाकर उनके बच्चों को जहर पिलाकर उसे मार दूंगी। मेरे लिए यह कोई बड़ा कार्य नहीं है। बस आप आदेश दीजिए। तब कंस का आदेश पाने के पश्चात पूतना ने ब्रज के अलग-अलग गांवों में जाकर नवजात पैदा हुए अनेक शिशुओं को जहर पिलाकर उनका वध करना शुरू कर दिया। उधर नंद बाबा ने बड़े ही हर्षोल्लास के साथ अपने पुत्र का जन्मोत्सव मनाया। उन्होंने अपने राज्य के प्रत्येक ब्राह्मण एवं व्यक्तियों को मुंह मांगे उपहार दिए। शुकदेव गोस्वामी बोले कि हे महाराज परीक्षित! पूतना को किसी गांव से खबर मिली कि 6 दिन पहले गोकुल में नंद महाराज ने अपने पुत्र का बड़े हर्षोल्लाह से जन्म महोत्सव मनाया है। तब वह गोकुल गई और उसने देखा की नंद बाबा तो वहां के राजा हैं और किसी राजा के घर में प्रवेश करना कोई आसान कार्य नहीं है। तब उसने अपनी योग माया से इतनी सुंदर स्त्री का रूप धारण किया मानो बैकुंठ से साक्षात लक्ष्मी धरती पर आ गई हों। सभी गोकुलवासी उसके इतने सुंदर रूप को देखकर उसकी तरफ आकर्षित हो गए। उनके पूछने पर पूतना बोली कि मैं इसी गोकुल की रहने वाली हूं और यशोदा नंदन के दर्शन करने आई हूं। तब यशोदा माता ने पूतना को टालते हुए - समझाने का, मनाने का बहुत प्रयास किया लेकिन पूतना नहीं मानी। उसके पश्चात मां यशोदा अपने पुत्र के दर्शन कराने उसे अपने साथ ले गई और फिर किस प्रकार भगवान ने पूतना का वध किया यह सारी लीला का वृतांत प्रभु ने अपने श्री मुख से बहुत सुंदर ढंग से सुनाया।
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उन्होंने बताया कि भगवान सत, चित एवं आनंद हैं इसलिए भगवान श्री कृष्ण को सच्चिदानंद कहते हैं। जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लग जाता है तो उसकी जीवन में भगवान स्वयं आते हैं और जब भगवान श्री कृष्ण किसी के जीवन में आते हैं तो उसके जीवन में आनंद आता है यह बात शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को समझाते हुए बता रहे हैं। उन्होंने कथा के प्रसंग में राजा बलि के चरित्र का व्याख्यान किया कि कैसे उन्होंने 3 पग भूमि वामनदेव को दान दी और अंतिम पग को पूर्ण करने के लिए भगवान का श्री चरण रखने के लिए खुद भगवान की शरणागति ले ली। प्रेस सचिव भारत मदान ने बताया कि यह संवाद करते हुए उन्होंने 18वीं श्रीमद् भागवत कथा को विश्राम दिया। इस्कॉन समिति के की ओर से 18 जुलाई को आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए सभी सादर आमंत्रित किया। इस्कॉन प्रचार समिति के दशरथी चरण दास, राधा ऋषिकेश दास, रामभद्र केशव दास, महाभानु मुरारी दास, संजय सखा दास, भास्कर धाम दास, ऐन्द्रा जीवन दास, सचि दुलाल दास, भीमा अभय दास, राम्या पलका दास, सवरूपा नंदी दास, विनय कृष्ण दास, यजुनन्दन प्राण दास से आशीर्वाद लिया।

श्रीमद् भागवत कथा के दौरान श्रद्धलु। स्वय

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