कैथल। भारतीय परंपरा अनुसार ही पर्व त्योहार को श्रद्धा आस्था और धार्मिक रीति रिवाज अनुसार मनाया जाता है। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि श्रावण मास में आती है। 26 फरवरी को मनाए जाने वाले महाशिवरात्रि के पर्व को लेकर गंगोत्री गोमुख हरिद्वार से कावड़िये पुण्यदायिनी पाप नाशिनी मां गंगा का जल लाकर शिवालियों में भगवान शंकर पर चढ़ाते हैं व पुण्य के भागी बनते हैं।
यह जानकारी शिक्षाविद संगीतज्ञ श्याम सुंदर गौड़ ने दी है। बताया कि महाशिव फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी वाले दिन मंदिरों में शिव आराधना की जाती है। गंगाजल, दूध, दही, बिलाव पत्थर, भांग धतूरा के द्वारा शिव अर्चन किया जाता है। श्रद्धालु स्त्री पुरुष और युवा व्रत रखते हैं। रात्रि के 12:00 बजे व्रत खोला जाता है।
इस दौरा अन्न का परित्याग करते हैं। फल दूध चाय फलाहार का प्रयोग करते हैं। कई स्थानों पर भांग धतूरा का भी सेवन किया जाता है लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए। गौड़ ने बताया कि भगवान देवी देवता केवल श्रद्धा के ही भूखे हैं। आजकल श्रद्धा नहीं रही है। दिखावा आडंबर ज्यादा रह गया है। धक्का मुक्की से हानि ही उठानी पड़ सकती है।
बड़े-बड़े मंदिरों में श्रद्धालुओं के साथ दक्षिण के लिए अनुचित व्यवहार तथा मारपीट तक की जाती है, जो शोभनीय नहीं है। यह आस्तिक को नास्तिक बनाने का कारण भी बनती है। ईश्वर के लिए सभी समान है। इस दिन ही तपस्या से प्रसन्न होकर पर्वतराज हिमालय की बेटी पार्वती से भगवान शंकर का विवाह संपन्न हुआ था। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जिनका वास्तविक नाम मूल शंकर था को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
मूल शंकर से स्वामी दयानंद बने थे। इस दिन तीन बार मंदिरों में आरतियां की जाती हैं। शिव की सत्य है सुंदर एवं कल्याणकारी है। शिव मृत्यु के देवता हैं। 12 ज्योतिलिंर्गों के दर्शन से मन को शांति मिलती है। शिवलोक की प्राप्ति भी होती है। शिव पुराण में शिव के विषय में विशद वर्णन मिलता है। शुद्ध भावना कल्याण सम्मान नितांत परम आवश्यक है। भावना ही देखी जाती है आत्मा शुद्ध भक्ति भी इसी में छिपी हुई है।