शहर कैथल से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव खुराना वीरों और दानवीरों की भूमि के नाम से जाना जाता है। गांव में एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिससे गांव खुराना सहित आसपास के गांवों की भी मान्यता जुड़ी है। गांव के लोगों ने सामाजिक, धार्मिक और शिक्षण से जुड़ी संस्थाओं में लाखों रुपये दान देकर अपनी दानवीरता का परिचय दिया है। ग्रामीण बुजुर्ग पूर्व सरपंच मिया सिंह, पूर्व सरपंच फकीर चंद, ओमप्रकाश, रामफल सरपंच और केहर सिंह ने बताया कि गांव में आज सांझे काम ग्रामीणों की एकता से होते हैं। गांव का नाम शुरू से ही खुराना है।
400 वर्ष पहले बसा था गांव-गांव का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उनकी कई पीढ़ियां इसी गांव में हुई हैं। बुजुर्ग मिया सिंह ने बताया कि यह गांव 400 वर्ष पहले मलिक गोत्र के लोगों ने बसाया था। इस गोत्र के लोग हांसी के नजदीक स्थित उमरा-सुल्तानपुर से आकर यहां बसे थे। यहां की भूमि उपजाऊ होने के कारण लोग खेती करने लगे। आज भी गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती ही है। कुछ ग्रामीण अपना खुद का कारोबार भी कर रहे हैं।
चार हजार से ज्यादा है गांव की आबादी-गांव खुराना की आबादी 4000 के करीब है। गांव में 3000 के करीब मतदाता हैं। गांव की साक्षरता दर 80 प्रतिशत से ज्यादा है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में एक प्राचीन शिव मंदिर भी है, जिसकी सैकड़ों वर्ष पुरानी मान्यता है। गांव में बहुत से महान व्यक्तियों ने जन्म लिया, जिन्होंने सामाजिक उत्थान और अन्य क्षेत्रों में अतुलनीय योगदान दिया है।
व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में भी ग्रामीणों की रूचि-ग्रामीण बुजुर्गों ने बताया कि गांव के लोगों की व्यापार और राजनीति में भी काफी रूचि है। गांव के अग्रवाल समाज के लोगों ने शहर में कई शिक्षण संस्थान और आमजन के काम आने वाले संस्थान खोले हैं। आज भी गांव के लोग उनका और वे ग्रामीणों का पूरा मान-सम्मान करते हैं। इसके अलावा गांव के सरपंच रामफल मलिक ने इस बार विधानसभा का भी चुनाव लड़ा है।
सामाजिक सौहार्द की गांव की विशेषता:-बुजुर्गों ने बताया कि गांव का सामाजिक सौहार्द ही गांव की विशेषता है। आज भी सभी बिरादरियों के लोग यहां मिलकर रहते हैं। सामाजिक कार्यों में सबकी भागेदारी समान रहती है। सौहार्द की यही परंपरा गांव में शुरु से चली आ रही है, जो आगे भी जारी रहेगी।