संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। जिले को एनीमिया मुक्त करने के लिए जिला स्वास्थ्य विभाग 100 दिवसीय अभियान चलाएगा। यह अभियान 11 जून से शुरू किया जाएगा, इसमें लगभग 3.5 लाख लोग जिसमें बच्चों, किशोरों और महिलाओं आदि में खून के सैंपल लेकर एनीमिया की जांच की जाएगी। यह जानकारी सिविल सर्जन डॉ. रेणु चावला ने दी।
उन्होंने बताया कि अभियान के लिए टीमों का गठन किया जा चुका है और चिकित्सा अधिकारियों तथा कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। पीएचसी, सीएचसी, नागरिक अस्पताल और आंगनबाड़ी केंद्रों पर शिविर आयोजित किए जाएंगे। इसके अलावा फील्ड स्टाफ गांव स्तर पर स्क्रीनिंग टेस्ट भी करेगा। इसके लिए छह टारगेटिड ग्रुप जिसमें 0-5 वर्ष, 6-9 वर्ष, 10-19 वर्ष आयु के लोगों के खून की जांच की जाएगी। विशेष रूप से स्तनपान कराने वाली और गर्भवती महिलाएं के खून की जांच की जाएगी।
उन्होंने बताया कि पिछले दिनों स्क्रीनिंग कैंपों के दौरान लगभग 70 प्रतिशत लोग आम तौर पर एनीमिया से पीड़ित पाए गए हैं। एनीमिया की जांच के अलावा लोगों को एनीमिया के बारे में जागरूक किया जाएगा। अभियान के दौरान टीम 4 टी यानि टेस्ट, ट्रीट, टॉक और ट्रैक पर ध्यान केंद्रित करेगी।
पहली बार गंभीर एनीमिया वाले लोगों का केस स्टडी भी किया जाएगा। अभियान के दौरान 180 व्यक्तियों (प्रत्येक लक्षित समूह से 30) की पहचान की जाएगी और एनीमिया के प्रकार और इसके कारणों का पता लगाने के लिए पूर्ण परीक्षण किए जाएंगे। गंभीर एनीमिया वाले लोगों को जिला अस्पताल में रेफर किया जाएगा, जहां रोग विशेषज्ञ इनका इलाज करेंगे।
उन्होंने कहा कि स्कूल में आयरन की गोलियां वितरित की जाएंगी और बच्चों के लिए सिरप भी वितरित किया जाएगा। यह भी सुनिश्चित करने का निर्णय लिया गया है कि बच्चे गोलियां और सिरप का सेवन समय पर करें। उन्होंने बताया कि एचबी का सामान्य मान 11 से अधिक माना जाता है जबकि 10 से 10.9 के बीच का मान हल्का एनीमिया, 7 से 9.9 के बीच का मान मध्यम तथा 7 से कम का मान गंभीर एनीमिया की श्रेणी में आता है।
ये हैं एनीमिया के प्रमुख लक्ष्ण
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हथेलियों, आंखों की पुतली, नाखुन, त्वचा में सफेदी होना।
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चक्कर आना, थकावट और उर्जा की कमी होना।
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व्यायाम या भारी काम करने पर ह्रदय गति का बढ़ जाना।
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खेलकूद व पढ़ाई में अरुचि।
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पैरों में सूजन होना व ऐंठन होना।
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संक्रमण से रोग प्रतिरोधक क्षमता का कम हो जाना।
ये हैं कारण
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भोजन में आयरन प्रचुरता वाले पदार्थ नहीं लेना अथवा कम लेना।
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लिंगभेद के कारण लड़कियों को संतुलित आहार नहीं देना।
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विटामिन सी की कमी के कारण जैविक रूप से आयरन की
आपूर्ति कम ।
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बच्चों के भोजन में फोलिक एसिड और विटामिन बी 12 की मात्रा नहीं होना।