संवाद न्यूज एजेंसी
पाई। रक्षा बंधन पर्व के उपलक्ष्य में पिलनी के कष्ट निवारण तीर्थ पर सोमवार को मेला लगा। इस मेले में हवन कर भंडारा लगाया गया। मेले को लेकर महंत शिवम गिरी ने बताया कि महाभारत काल से हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को गांव के कष्ट निवारण तीर्थ पर मेला लगता है। मान्यता है कि यह एक ऐसा तीर्थ है, जिस पर स्नान करने से शरीर के सभी प्रकार के कष्ट खत्म हो जाते । इस तीर्थ को बाबा देवी दास की कुटिया के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने बताया कि इस तीर्थ का जिक्र महाभारत काल से किया जाता है। यहां पर जब महाभारत के जख्मी घोड़ों और किसी के सैनिकों को बीमारी हो जाती थी, तो इस की मिट्टी का लेप करके स्नान करा जाता था और वह ठीक हो जाता था। इतिहास में ऐसा बताया जाता है कि जब कृष्ण भगवान अपने रथ को उनके साथ ही गांव से लेकर गुजर रहे थे तो उनके रथ के पहिये की एक पिल्ली इस स्थान पर गिर गई थी और यहां पर बसे लोगों ने उसको ढूंढने का प्रयास किया तो इस गांव का नाम पिलनी रख दिया। जब से इस गांव को पिलनी के नाम से जाना गया।
वर्तमान में ऐसा माना जाता है कि अगर किसी को काया का कष्ट है और यहां पांच रविवार स्नान कर ले और पूर्णमासी को हवन कर प्रसाद बांट दें, तो उसके सभी प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। यहां पर उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, चंडीगढ़ आदि दूर-दूर के प्रदेशों के लोग स्नान करने के लिए आते हैं।
महंत शिवम गिरी, सरपंच राजकिशन, सरपंच प्रतिनिधि नरेंद्र शर्मा, ग्रामीण सुदमा, सतीश, मोनू, अनिल, नसीब, गगन, धर्मपाल, बीरजीत, सुरेश शर्मा, रामदिया आदि समस्त ग्रामीणों ने मेले हवन व भंडारे में सहयोग दिया।
महंत शिवम गिरी ने बताया किंवदंती के अनुसार, पहले यहां जंगल हुआ करते थे और जंगलों के बीच बाबा देवी दास रह कर तपस्या करते थे। बाद में बाबा देवीदास ने समाधि ले ली थी।
इन जंगलों के पास एक शिव मंदिर होता था, जिसमें एक नागा साधु रहता था, उस साधु को कोढ़ की बीमारी थी। एक रात बाबा देवी दास उसके सपने में आए और उसे बताया कि पास के जंगलों में उनकी समाधि है और वहीं पास तालाब है। तुम उस तालाब में पांच रविवार स्नान करने के बाद पूर्णिमा को प्रसाद बांट देगा तो उसके शरीर का कोढ़ दूर हो जायेगा।
इस पर उस साधु ने ऐसा ही किया और उसके शरीर का कोढ़ ठीक हो गया। तब से इस महत्व बढ़ता ही गया और लाखों लोग अपने शरीर के रोग दूर कर चुके है। उन्होंने दावा कर बताया कि इसका जिक्र महाभारत के इतिहास में भी मिलता है।