62...कात्यायिनी माता के स्वरूप का पूजन करते भक्त।
कैथल। नवरात्र के छठे दिन जिले के 11 रुद्री, बड़ी माता व अन्य मंदिरों में मां कात्यायनी की पूजा की गई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने कतार में लगकर मां कात्यायनी की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालु पहुंचने शुरू हो गए थे। इस दौरान महिलाओं ने भजनों से माता की महिमा का गुणगान किया। इसके अलावा मंदिरों में भंडारे भी लगाए गए। जिनमें सैकड़ों भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।
ग्यारह रुद्री मंदिर के पुजारी मुनिंदर ने कहा कि मां कात्यायनी को बेमाता के नाम से भी जाना जाता है। बच्चे के जन्म के बाद छठे दिन जब उसे वस्त्र पहनाए जाते हैं तो उसी दिन जो माता बच्चे का भाग्य लिखती है वह कात्यायनी माता ही होती हैं। माना जाता है कि मां के इस स्वरूप की पूजा अर्चना से विवाह में आ रही परेशानी दूर हो जाती है। मान्यता है कि देवी के इस रूप को गुड़ या शहद से बनी चीजों का भोग बेहद प्रिय होता है। ऐसे में माता को गुड़ का हलवा अर्पित कर सकते हैं। मां कात्यायनी को पीला रंग प्रिय है इसलिए पूजा के लिए पीले रंग का वस्त्र धारण करना शुभ होता है। मां को अक्षत, रोली, कुमकुम, पीले पुष्प और भोग चढ़ाना चाहिए।
महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण माता का नाम कात्यायनी पड़ा। इन्होंने देवी जगदंबा को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप किया था। महर्षि कात्यायन के घर पर जन्म लेने के बाद ही उन्हें कात्यायनी कहा गया। उन्होंने महिषासुर जैसे दानवों का संघार करके देवताओं को असुरों के अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। इसलिए उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहते हैं। मां कात्यायनी अपने भक्तों को भय से मुक्ति, समृद्धि, विजय, साहस और आत्मविश्वास प्रदान करती हैं। उनकी पूजा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, कार्यों में सफलता मिलती है और मनवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।