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डीसी ने इतिहास के पन्नों में खो गए शहीदों को याद कर पेश की मिसाल

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74वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह पहला अवसर था, जब जिले में कोई मंत्री या प्रदेश मुख्यालय से कोई बड़ा अधिकारी बतौर मुख्य अतिथि शामिल नहीं हुआ, बल्कि इस आयोजन की जिम्मेवारी के केंद्र बिंदू खुद डीसी ही मुख्य अतिथि रहे। डीसी ने अपने भाषण में उन सभी शहीदों को तो याद किया ही, जो अक्सर ऐसे अवसरों पर याद किए जाते हैं, लेकिन उन्होंने उन शहीदों व क्रांतिकारियों को भी याद किया, जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए।
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डीसी ने अपने भाषण की शुरुआत मेें ही शहीदों, क्रांतिकारियों सहित स्वतंत्रता सेनानियों को नमन किया। साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, बिश्मिल, जवाहर लाल नेहरू, लाला लाजपत राय, वीर सावरकर, वल्लभ भाई पटेल, लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, अश्फाक उल्ला खान, भगत सिंह जैसे शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया। उनके द्वारा एक लक्ष्य को लेकर कैसे आजादी के प्रयास किए गए, उन पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही अक्सर ऐसे अवसरों पर कम ही याद किए जाने वाले लाल, बाल, पाल के संयुक्त बलिदान को याद किया। उन्होंनेे पश्चिम बंगाल के तीन 19 से 22 साल के युवाओं विनोय बशु, दिनेश गुप्ता तथा बादल गुप्ता को याद किया। जिन्होंने कम उम्र 22, 18 व 19 वर्ष की आयु में ही क्रांतिकारी सोच को धारण करते हुए कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में विदेशी वस्त्र धारण कर दमनकारी कर्नल एनएस सिम्पसन से बदला लिया और पकड़ें जाने पर विदेशी ताकतों के आगे समर्पण की बीाए खुद ही सॉयनाइड खाकर जीवन समाप्त कर दिया।
डीसी ने मदुरै की मयंदी भारती को याद किया। उन्होंने आजाद भारत के बाद 1962 में लड़ी गई यूनेस्को की रेयर आठ आधुनिक सेना में शामिल भारत-चीन लड़ाई में शहीद हुए मेजर शैतान सिंह व उनके 120 जांबाज जवानों को याद किया। जिन्होंने 1200 से अधिक चीनी सेना के जवानों को मौत के घाट उतार दिया और चीन की सेना ने भी इन सैनिकों के शव सम्मान के साथ सौंपें थे। 120 में से 114 जवान शहीद हो गए थे, जिनके शव कई माह बाद जब भारत को सौंपें गए, तब जाकर इस अद्वितीय लड़ाई का दूनिया को पता चला। इसे रेजांग्ला की लड़ाई कहा जाता है। ऐसे वीरों की बदौलत ही देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है।
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डीसी ने एक उदहारण दिया कि एक देश मेें एक नदी पर जापान की मदद से हर साल आने वाली बाढ़ से बचने के लिए मजबूत पुल बनाया, लेकिन उस जगह पर 74 इंच एक ही दिन में हुई बारिश से नदी का रास्ता ही बदल गया। पुल आज भी वहीं खड़ा है, लेकिन नदी उसके नीचे से नहीं बह रही। यही हालात आज कोरोना काल के हैं, इसीलिए हमें बिल्ड टू स्टे की बजाए बिल्ड टू एडॉप्ट की नीति अपनानी चाहिए। कोरोना महामारी कभी भी अपना रुप, स्वरुप बदल सकती है। इसीलिए हमें इसी हिसाब से वर्तमान में आए संकट से लड़ना चाहिए।
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