पूंडरी। श्राद्ध पक्ष में हर घर-आंगन में खीर और पूड़ी बनाकर कौवों को अर्पित करने की परंपरा है। मान्यता है कि कौवा पितरों का दूत होता है और उसे भोज कराने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है। लेकिन इस बार श्राद्धों में कौवे गायब हैं। दीवारों और छतों पर रखे थाल ज्यों के त्यों पड़े रह गए। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले श्राद्धों में कौवों की कांव-कांव से वातावरण गूंज उठता था और लोग इसे पितरों की प्रसन्नता मानते थे।
ग्रामीण इलाकों और कस्बों में यही हाल है। पर्यावरण प्रेमियों अनिल आर्य, संजय और शरद का कहना है कि बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और प्रदूषण के कारण कौवों की संख्या में कमी आई है। खुले स्थानों और पेड़ों की कमी से पक्षियों के लिए घोंसला बनाने और भोजन तलाशने में दिक्कत हो रही है।
गांव फरल, टयोठा, बरसाना, पाई, भाणा और सिरसल के लोग कहते हैं कि कौवों के न होने से श्राद्धों की परंपरा अधूरी लग रही है। कई परिवारों ने चिंता जताई कि यदि यह हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियां इस परंपरा से पूरी तरह कट सकती हैं। संवाद