जिले में ऐसे अन्य मामले भी सामने आए हैं, जिनमें बच्चे गेम में हथियार खरीदने या अपने करैक्टर को अपग्रेड करने के लिए घर में चोरी जैसी वारदातों को अंजाम देने लगे। काउंसलर्स के अनुसार, गेम के दौरान मिलने वाले वर्चुअल रिवार्ड्स बच्चों के दिमाग में डोपामाइन का स्तर बढ़ा देते हैं, जिससे उन्हें सही और गलत का फर्क समझ में नहीं आता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते हस्तक्षेप न किया जाए, तो ऐसे बच्चे गंभीर अपराध या आत्मघाती कदम भी उठा सकते हैं। अभिभावकों को सलाह दी गई है कि वे बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों में जैसे अकेले रहना, चिड़चिड़ापन, मोबाइल छीनने पर आक्रामक प्रतिक्रिया—पर सतर्क नजर रखें। यदि बच्चा गेमिंग की लत का शिकार है, तो तुरंत पेशेवर मदद लें।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी के बावजूद जिले का मुख्य स्वास्थ्य केंद्र खुद संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। नागरिक अस्पताल में करीब एक साल से कोई स्थायी मनोचिकित्सक तैनात नहीं है। वर्तमान में पूरा उपचार काउंसलर्स के भरोसे चल रहा है। गंभीर मानसिक विकारों से पीड़ित मरीजों को दवाइयों या विशेष इलाज के लिए रोहतक पीजीआई अथवा अन्य बड़े चिकित्सा केंद्रों में रेफर करना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग की यह कमी उन परिवारों पर भारी पड़ रही है, जो निजी इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।
डोपामाइन एक न्यूरोट्रांसमीटर (रासायनिक संदेशवाहक) है, जिसे फील-गुड या आनंद हार्मोन भी कहा जाता है, जो मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संदेश पहुंचाता है। यह प्रेरणा, खुशी, ध्यान, स्मृति और शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। यह विशेष रूप से तब निकलता है जब हम कुछ सुखद या पुरस्कृत अनुभव करते हैं।