संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। आरकेएसडी कॉलेज के स्टाफ कक्ष में साहित्य सभा की मासिक काव्य गोष्ठी हुई। राजेश भारती काकौत ने सुनाया- ‘मरने की परमीशन दे या भूखों को भोजन दे, गम से भीगी आंखों को खुशियों का भी सावन दे।’ युवा कवि राजेश भारत ने कहा कि ‘वो पर्वत पर चढ़ता जाए और लहरों से लड़ता जाए।’ डॉ. विकास आनंद ने अपनी रचना, धन बल की दुश्मन होवे सै शराब सुनाई।
इससे पूर्व गोष्ठी का आगाज डॉ. अशोक की कविता ‘पत्रकारिता एक सेवा है, बेसहारा का सहारा है...’ से हुआ। दिनेश बंसल की बानगी देखिए करूं तुझसे मैं इल्तिजा क्या, तेरी मर्जी नहीं मेरी रजा क्या। अनिल कौशिक ने कहा कि ‘मां चाहती है संतान का उज्जवल भविष्य।’ श्याम सुंदर गौड ने कहा कि ‘ये देश हमारा है इसे बंटने नहीं देंगें, इज्जत किसी को भी लूटने नहीं देंगें।’ सतपाल आनंद ने कहा कि ‘भजन कीर्तन हो रहे, रोज सुनै उपदेश बेराह ना क्यूं फेर भी, घर में रहवै कलेश।’ डॉ. चतुर्भुज बंसल ने कहा कि ‘नाम राम का लेणा हो जे बालक का इसा टेको नाम जद भी उसने पुकारै गैले लिकड़े मुंह तै राम।’
मधु गोयल ने नए साल स्वागत करते हुए कहा कि नया साल आएगा मुझको भूल जाएगा, मैं दिसंबर हूंं चला जाऊंगा। शमशेर कैंदल ने कहा कि ‘संगीतमय सी बयार चली पतों में था गाने का फितूर, हर टहनी एक दूसरे से मिलने को दिख रही थी आतुर।’ रजनीश शर्मा ने कहा संगीत हर जगह है कोयल की कूक में दिल की धडक़न में हर जगह मौजूद है। महेंद्र पाल शर्मा पाई ने ‘एजी एजी निशयान्नी जंग महामारी की, घणे कसूते सौण भिडयावै हौणी जनहारी की।’
नीरू मेहता ने कहा कि ‘क्या लिखूं किस बात पर लिखूं देश पर लिखूं या दिन रात पर लिखूं।’ रामफल गौड़ ने कहा कि ‘लिकडं गया जो वक्त हाथ से कै लिकडय़ा का गम करना।’ ईश्वर गर्ग ने कहा कि ‘काम करते जाइए चुपचाप अपना, फिर पिघलता देखिए संताप अपना।’
रिसाल जांगड़़ा ने कहा कि ‘किसे मौत ने छल नहीं, सूरज भी क्या ढला नहीं।’ डॉ. हरीश झडंई ने सुनाया ’जिंदगी समुद्र जैसी है, समुद्र दिखता है शांत।’ कमलेश शर्मा ने अपनी कविता सत्ता का मोतियाबिंद सुनाकर सबका मन मोह लिया। गोष्ठी की अध्यक्षता कमलेश शर्मा की व मंच संचालन रिसाल जांगड़ा ने किया। इसके अलावा गोष्ठी में टीसी अग्रवाल, प्रीतम शर्मा, रविंद्र मित्तल व अनिल गर्ग धनौरी मौजूद रहा।