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सोशल मीडिया के बीच बचपन की तलाश

Tue, 30 Aug 2016 12:32 AM IST
ब्यूरो कैथल
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एकजुट होकर बड़े भी खेलते हैं बच्चों के संग - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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 तकनीकी युग में भविष्य की जरूरतों की शुरुआत भर है ये। आज 20 वर्ष या उससे अधिक की उम्र के लोगों ने जिस तरह से बचपन का लुत्फ उठाया था। वह आज के तकनीकी युग में कहीं खो सा गया है। आज का बचपन बाहर मैदान में कम सोशल मीडिया की दुनिया में खो सा गया है। बच्चे फेसबुक, व्हॉटस-एप, टीवी में इतने व्यस्त हैं कि उनका बचपन फीका होता जा रही है। बचपन की इसी खुशी को बचाने और परंपरागत खेलों, जो न कि सिर्फ मानसिक बल्कि शारीरिक रूप से भी मजबूत करते थे, को बचाने के लिए प्रयास शुरू किया है शहर के सेक्टर 19 में संस्था लायंस क्लब आस्था ने। आश्चर्य नहीं होगा, जब भविष्य में बच्चों की सोशल मीडिया से लत छुड़वाने के लिए विशेषज्ञों का सहारा लेना होगा।
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हर रविवार को होता है खेलों का आयोजन
क्लब सदस्यों, जिनमें ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। हर रविवार को एकत्रित होती हैं। वे अपने आस-पास के बच्चों को एकत्रित करके सेक्टर 19 के पार्क में पहुंचते हैं। जहां वे मोबाइल और टीवी की बनावटी दुनिया से दूर आउटडोर खेलों का आयोजन करते हैं। खेल भी वे, जिन्हें बचपन में आज से करीब एक से दो दशक पहले खेला जाता था। वहीं जहां बड़े इस कोशिश में लगे हैं कि बच्चे अपने शरीर की मूल जरूरतों को न भूलेें वहीं बच्चे इस दिनचर्या में उत्साह से भाग लेते हैं।

यादों में बचे ये खेल होते हैं शामिल
इस आयोजन में परंपरागत खेलों में जूते चप्पल एक घेरे में रखकर उन्हें उठाने, पकड़म-पकड़ाई, चोर-पुलिस, खो-खो, रुमाल रख, चूहा-दौड़ बिल्ली आई, हरा समंद्र गोपी चंद्र.., बोल मेरी मछली कितना पानी जैसे खेल खेले जाते हैं।
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क्लब सदस्यों में प्रधान निशा अरोड़ा ने बताया कि हम पिछले कई दिनों से यह महसूस कर रहे थे कि हमारे बच्चे आज टीवी, मोबाइल से चिपके रहते हैं। जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पा रहा है। इसी कारण से हमने सोचा कि क्यों ना हम उन पुराने खेलों को फिर से खेलें। इसके बाद अब वे ना केवल बच्चों को खिलाते हैं। बल्कि खुद भी उनके साथ अपनी बचपन की यादें ताजा करते हैं। प्रयास किया जा रहा है कि पार्क की बजाए किसी अन्य जगह पर ये खेल करवाएं जाएं। ताकि बच्चों को परेशानी ना हो। क्लब सदस्यों डा. एसके छतवाल, रानी भूरिया, डा. अशोका जिंदल, सुमन मेहता, सुषमा मेहता सहित सभी सदस्य सहयोग करते हैं।

सोशल मीडिया से हो सकते हैं मानसिक रोग
मनोचिकित्सक डा. विवेक गर्ग का कहना है कि यदि हर समय बच्चा सोशल साइट में लगा रहेगा तो वह मानसिक रोगी भी हो सकता है। सामाजिक हिस्सेदारी से उसकी दूरी और स्वभाव चिड़चिड़ापन होना इसमें आता है।  इससे न सिर्फ उसकी पढ़ाई प्रभावित होगी बल्कि उसका शारीरिक विकास भी रुक जाएगा। इसलिए समय की मांग है कि सोशल मीडिया को आदत न बनाएं। बच्चों के चहुंमुखी विकास के लिए जरूरी है कि बच्चे बाहरी खेलों को अधिक समय दे स्वस्थ जीवन की तरफ बढ़ें।
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