संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। समय के साथ-साथ विवाह की रस्मों और गीतों में भी परिवर्तन आया है। पहले दूल्हा और दुल्हन के लिए बुजुर्ग महिलाएं जो गीत गाती थीं, उनमें रस होता था, लेकिन अब काफी फूहड़ता शामिल हो गई है और रस गायब हो गए हैं। गीतों से लेकर दुल्हन की विदाई के तरीके भी काफी बदले हैं। इस संबंध में बुजुर्गों से बातचीत की गई। उनके विचार इस प्रकार रहे।
शहरवासी बुजुर्ग कृष्ण कालड़ा ने बताया कि पुराने समय में जो गीत गाए जाते थे वो समाज के बनाए ऐसे गीत थे जो दिल से गाए जाते थे। आज के समय में जो गीत गाए जाते हैं वो अधिक फूहड़ होते हैं और वे दिल से नहीं गाए जाते। आज के समय में लोग केवल खानापूर्ति ही करते हैं। आजकल की लड़कियां विदाई के समय आंसू तक नहीं बहाती क्यों की रोने से उनका मेकअप खराब होने का डर रहता हैं। आजकल शादी के से पहले ही लड़का और लड़की एक-दूसरे को जान लेते हैं, लेकिन पहले के समय पति-पत्नी न तो एक-दूसरे को जानते थे, न ही आपस में मुंह तक देख पाते थे।
शहरवासी बुजुर्ग महिला शशि देवी ने कहा कि पुराने समय में जब लड़की की विदाई होती थी तो अपने माता-पिता से गले मिलकर रोती थी। उसके बाप की आंखों में आंसू भर आ जाते थे। फिर वे अपनी बेटी को विदा करते थे। बेटी को वास्तव अपने मां बाप से विदा होने का दुख होता था।
उन्होंने बताया कि वह अपने घर को छोड़ कर हमेशा के लिए ससुराल जाती है। पुराने समय में विदाई के समय पंजाबी में ये गीत गाए जाते थे, जैसे चिडिय़ा दा चंबा वे, माए नी माए असी उड जाणा, साढ़ी लंबी उडारी वे असां ते उड जाणा। इसके अलावा बेटी के विदाई के समय एक गीत और गाया जाता था। शावा चरखा चनन दा और बाबुल की दुआएं लेती जा जा तुझको सुखी संसार मिले। अब गीतों में भी बदलाव आया है। दूल्हा और दुल्हन के लिए अलग-अलग गीत गाए जाते थे।