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Kaithal News: गांव बाबा लदाना दशहरा मेला कल से, तैयारियां पूरी

Thu, 02 Oct 2025 06:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
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34 बाबा लदाना गांव में स्थित डेरा बाबा राजपुरी
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कैथल। गांव बाबा लदाना के डेरा बाबा राजपुरी में दशहरे के बाद शुरू होने वाले तीन दिवसीय वार्षिक मेले की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 550 साल से लगने वाले इस मेले की मान्यता है कि कि यहां पर पशुओं की सुख-समृद्धि के लिए जो मन्नत मांगी जाती है, वह पूरी होती है।
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इसलिए हरियाणा सहित पंजाब, राजस्थान, दिल्ली व यूपी से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु डेरे पर पहुंचते हैं। इस बार पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को धूप सामग्री वितरित की जाएगी। जिसे आग पर डालकर पशुओं के आसपास धूनी दी जाती है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक डेरा बाबा राजपुरी की मान्यता इतनी है कि मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु लाखों रुपये की कीमत के पशु भी दान करके जाते हैं। पूजा के दौरान घी व यहां दूध मुख्य चढ़ावा होता है। दशहरा की शाम को शुरू होने वाला मेला तीन दिन तक चलता है। एकादशी पर सबसे ज्यादा भीड़ लगती है। तीसरे दिन बाबा लदाना व आसपास के गांव की महिलाएं पूजा करती हैं। इसी दिन कुश्ती दंगल भी करवाया जाता है। महंत दूजपुरी के मुताबिक बाबा राजपुरी का जन्म गांव बाबा लदाना में हुआ था।
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उन्होंने 8 साल की उम्र में ही घर छोड़कर चोला धारण कर लिया था। बाबा राजपुरी 52 शक्तिपीठ में शामिल माता हिंगलाज को काफी मानते थे। इसके बाद बाबा लदाना में डेरे की स्थापना की। डेरे में सैकडों वर्ष पुराना जाल का पेड़ है। मान्यता है कि माता हिंगलाज अष्टमी की रात को डेरे में बने मंदिर में आती हैं और वर्षों पुराने जाल के पेड़ पर धागा बांधती है। दशहरे के दिन इसी जाल के पेड़ पर बाबा राजपुरी और माता हिंगलाज की पूजा कर ध्वजा चढ़ाई जाती है।
महंत तोतापुरी महाराज की तपोस्थली:
पवन विपिन , पंकज जयपाल, विक्रम, और संदीप ने बताया कि मान्यता के अनुसार 550 साल पहले गांव में एक बच्चे का जन्म हुआ, जो शैशव काल से ही महान योगी की तरह थे। बाद में वे बाबा राजपुरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह डेरा स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस और उनके गुरु महंत तोतापुरी महाराज की तपोस्थली रहा है। यहां महंत तोतापुरी की समाधि भी है। ग्रामीणों के मुताबिक, माता हिंगलाज अष्टमी की रात को डेरे में बने मंदिर में आती हैं और वर्षों पुराने जाल के पेड़ पर धागा बांधकर जाती हैं। संवाद
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