संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। एक समय में जब भारत वैचारिक रूप से विभिन्न सम्प्रदायों में बंटा गया था, तब सभी संप्रदायों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए गुरु शंकराचार्य ने अद्वैत मत को स्थापित किया। यही अद्वैत मत हमारी सांस्कृतिक एकात्मता का परिचायक है।
यह बात महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमेश चंद्र भारद्वाज ने कही। मौका था महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय एवं भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में टीक परिसर में आयोजित जगद्गुरु शंकराचार्य के दर्शन एवं कार्यों पर व्याख्यान का। इसका विषय था भारत की सांस्कृतिक एकात्मता में शंकराचार्य का योगदान।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में हरियाणा साहित्य संस्कृति अकादमी के संस्कृत प्रकोष्ठ के निदेशक डॉ. चितरंजन दयाल कौशल एवं मुख्य अतिथि के रूप में महामंडलेश्वर स्वामी विरागानंद गिरि रहे। इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. चितरंजन दयाल कौशल ने कहा कि भारत के विश्वगुरु की परिकल्पना में आदि शंकराचार्य का योगदान महत्वपूर्ण है। इसी मार्ग पर चलकर अनंत काल तक भारत अखंड रहेगा।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित महामंडलेश्वर स्वामी विरागानंद ने आदि शंकराचार्य के जीवन दर्शन को बताया और आशीर्वचन प्रदान किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भारद्वाज ने कहा कि भारत भावनात्मक एवं सांस्कृतिक रूप से एक रहे। इसके लिए अध्यात्म और धर्म ही हमारा मार्ग प्रशस्त करेगा। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. कृष्ण चंद्र पांडे ने किया तथा मंच संचालन डॉ. नवीन शर्मा ने किया। इस अवसर पर आरकेएसडी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय गोयल सहित विश्वविद्यालय के शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. सत्य प्रकाश दुबे, अधिष्ठाता आईक्यूएसी प्रो. भाग सिंह बोदला, वेद-वेदांग संकाय अधिष्ठाता डॉ. सुरेंद्र पाल वत्स, साहित्य संस्कृति संकाय अधिष्ठाता डॉ. जगत नारायण कौशिक सहित सभी विभागों के अध्यक्ष, प्राध्यापक और कर्मचारी आदि उपस्थित रहे।