संवाद न्यूज एजेंसी
कैथल। प्रशासन ने पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए जिलेभर में 350 टीमों का गठन किया है, जिनमें करीब 800 अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं। ये टीमें गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक कर रही हैं।
रेड जोन में 50 किसानों पर एक कर्मचारी और येलो जोन में 100 किसानों पर एक कर्मचारी की ड्यूटी लगाई गई है। प्रत्येक गांव में एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त है जो पराली प्रबंधन उपकरण किसानों तक पहुंचा रहे हैं।
पराली जलाने के नुकसान
पराली जलाने से हवा में धुआं फैलता है, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। इससे मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे भविष्य की फसलों की पैदावार घटती है और भूमि की उर्वरता कम होती जाती है।
सहायक कृषि अभियंता जगदीश चंद्र मलिक ने बताया कि पराली जलाने वाले किसानों की मेरी फसल मेरा ब्योरा पोर्टल पर रेड एंट्री दर्ज की जा रही है। पंचायतों और मौजिज व्यक्तियों को गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक करने की जिम्मेदारी दी गई है। किसानों से अपील है कि वे पराली जलाने के बजाय हैप्पी सीडर, सुपर एसएमएस, रोटावेटर या बेलर जैसी मशीनों का उपयोग करें और खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखें।
उधर, कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार स्थिति बेहतर है। अब तक जिले में लगभग 40 प्रतिशत धान की कटाई पूरी हो चुकी है, जिसमें पीआर व 1509 किस्म शामिल हैं। जबकि बासमती, मुच्छल और 1121 किस्मों की आवक अब मंडियों में शुरू हुई है। यानी अभी भी लगभग 60 प्रतिशत धान की कटाई बाकी है।
राहत की बात यह है कि कटाई के बावजूद किसान पराली जलाने के बजाय अवशेष प्रबंधन की तकनीक अपना रहे हैं। इससे किसानों को प्रति एकड़ करीब 1200 रुपये का अतिरिक्त लाभ हो रहा है और भूमि की उर्वरा शक्ति भी बरकरार रह रही है।