कैंसर संस्थान बीकानेर, पीजीआई, जिंदल, एम्स तक के लगाए गए हैं फर्जी बिल
- तीन माह तक पुलिस के पास पड़ी रही मुख्यमंत्री राहत कोष से फर्जी बिलों के सहारे आवेदन के मामले में कार्रवाई के लिए फाइल
- जून में स्वास्थ्य विभाग ने लिखा था पुलिस अधीक्षक को पत्र
- अगस्त के अंतिम तारीख में दर्ज की एफआईआर, पुलिस अभी तक नहीं चल पाई एक कदम भी मामले में
- मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ा होने के बावजूद बड़ी लापरवाही, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने अस्पतालों के फर्जी बिल तक जुटा लिए
- महज 93 लाख की नहीं अकेले कैथल में 1.25 करोड़ से अधिक के आवेदन किए गए हैं फर्जी बिलों के सहारे, आधा दर्जन से अधिक मामलों का ओर हो सकता है खुलासा
नसीब सैनी
कैथल। मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद के लिए किए गए फर्जी बिलों के सहारे आवेदनों में बीकानेर कैंसर संस्था, एम्स, पीजीआई, जिंदल कैंसर अस्पताल हिसार सहित कई बड़े अस्पतालों के फर्जी बिल लगाए गए हैं। विभागीय जांच में इन संस्थानों ने स्पष्ट कर दिया है कि जो बिल यहां प्रस्तुत किए गए हैं, वे इन संस्थानों से जारी नहीं हुए हैं। दूसरी ओर इस फर्जीवाड़े के उजागर होने के बावजूद पुलिस ने विशेष रुचि नहीं दिखाई। यही कारण है कि जून माह में पुलिस को दे दी गई शिकायत के बाद पुलिस ने अगस्त माह की अंतिम तारीख में केस दर्ज किया है। अभी तक भी पुलिस इस मामले में एक कदम नहीं चल पाई है। जबकि स्वास्थ्य विभाग ने मरीजों का पूरा पता देने के साथ-साथ उन अस्पतालों की रिपोर्ट भी दे दी, जिनके नाम से फर्जी बिल लगाए गए हैं।
विभागीय सूत्रों के अनुसार 7 जून को स्वास्थ्य विभाग ने पुलिस को इस संबंध में पत्र लिखा था। इसके बाद से यह मामला पुलिस के पाले में हैं। अब विभाग ने 31 अगस्त को इस संबंध में केस दर्ज किया है। पुलिस ने 24 लोगों के खिलाफ फर्जी कागजातों के आधार पर आवेदन करने के आरोप में केस दर्ज किया है। लेकिन फिलहाल पुलिस जांच ही जारी है।
मुख्यमंत्री राहत कोष से आवेदन करने वाले लोगों ने कैंसर संस्थान बीकानेर, पीजीआई चंडीगढ़, एम्स नई दिल्ली, जिंदल अस्पताल हिसार सहित कई नामी-गिरामी संस्थानों के बिल लगाए हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा मार्च माह में शुरू की गई जांच में इन सभी संस्थानों को पत्र लिखकर बिलों की जांच करवाई गई तो बिल फर्जी निकले। पुलिस को दी शिकायत में इन बिलों के फर्जी होने की जानकारी भी विभाग ने पूरे विस्तार से दी है।
मेडिकल शब्दावली न होने के कारण पकड़ में आया पूरा मामला : विभागीय सूत्रों ने बताया कि आवेदन फार्मों पर शक बिलों की शब्दावली को लेकर हुआ। क्योंकि ब्लड कैंसर को बिलों में ब्लीड कैंसर लिखा हुआ था। जबकि डॉक्टर इसे ल्यूकेमिया लिखते हैं। इसी प्रकार से किडनी ट्रांसफर शब्द लिखा हुआ मिला, जबकि डॉक्टर ऐसा नहीं लिखते। इसी प्रकार से हॉर्ट ब्लॉकेज जैसे शब्द लिखे हुए मिले। जबकि डॉक्टर इस तरह की शब्दावली प्रयोग नहीं करते।
आधा दर्जन से अधिक और मामले आए पकड़ में, विभाग दे सकता है शीघ्र जानकारी : विभागीय जांच में करीब आधा दर्जन से अधिक और ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें प्रत्येक में 3 से 4 लाख 50 हजार रुपये तक के आवेदन किए गए हैं। इन आवेदनों के बिल भी फर्जी पाए गए हैं। इन मामलों को भी जांच के दायरे में लाया जा सकता है। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी मामले की जांच में जुटे हुए हैं।
प्रत्येक जिले में सामने आ सकती है गड़बड़ी : अकेले कैथल जिले में आए लगभग 30 से अधिक फर्जी आवेदनों में करीब एक करोड़ 25 लाख से अधिक की राशि की सहायता क्लेम की गई है। यदि इस पूरे मामले की जांच सभी जिलों में की जाए तो करोड़ों रुपये की गड़बड़ी का खुलासा हो सकता है। क्योंकि ये तो वे आवेदन हैं, जिनमें सहायता राशि जारी होने से पहले ही पकड़ में आ गए। ऐसे बहुत से मामले हो सकते हैं, जो पकड़ में न आए हों और उन्हें सहायता राशि जारी की जा चुकी हो।
एसपी आस्था मोदी का कहना है कि पुलिस पहले मामले की जांच कर रही थी। फिर फैसला लिया गया कि एफआईआर करके ही जांच पूरी की जाए। पुलिस द्वारा मामले में संलिप्त लोगों को शीघ्र ही जांच में शामिल किया जाएगा। दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।