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एनसीईआरटी की बजाए निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लगवा रहे हैं स्कूल संचालक

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एनसीईआरटी की बजाए निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लगवा रहे स्कूल संचालक
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पुस्तक के साथ जुड़ी होती है वर्कबुक, ताकी दोबारा किताबों का न हो सके उपयोग
निजी प्रकाशकों के साथ कमीशनखोरी के खेल का शिकार हो रहे अभिभावक
फोटो संख्या-29 व 30
नसीब सैनी
कैथल। निजी स्कूलों में एक बार फिर से अभिभावकों से लूट का खेल चल रहा है। निजी स्कूलों में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें जो हर साल बदलीं जाती हैं, इस बार भी धड़ल्ले से बदलकर अभिभावकों से खरीदवाई जा रही हैं। एक अदालत के फैसले का हवाला देकर कई बड़े स्कूलों ने तो अपने स्कूल परिसर में ही बुक्स का स्टॉल लगा दिया है। जबकि इस बार बाजार में एनसीईआरटी की पुस्तकें पर्याप्त संख्या में हैं। दूसरी तरफ हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी ने भी एक तरह से देखा जाए तो निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को पूरी तरह से बाजार के भरोसे छोड़ दिया है। बोर्ड द्वारा एनसीईआरटी के सिलेबस का हवाला देकर इन स्कूलों को मान्यता देने के बावजूद पढ़ाने के लिए एक भी पुस्तक प्रकाशित नहीं की जा रही। जिसका खामियाजा स्कूल संचालकों को भुगतना पड़ रहा है।
स्कूलों द्वारा दिया जा रहा है निजी प्रकाशकों को बढ़ावा : पुस्तक बिक्री से जुड़े एक व्यक्ति ने बताया कि इस बार भी अभिभावक बाजार के हवाले हैं। उनका तो रोजगार है। लेकिन हर बार महज वर्कबुक जोड़कर जिस तरह से पुस्तकों को ऐसा बनाया जा रहा है कि उसे दोबारा से प्रयोग न किया जा सके। यह काफी खराब है। इस बार भी अधिकतर स्कूलों ने पुस्तकें बदल दी हैं। कइयों ने प्रकाशक भी बदले हैं। कई प्रकाशकों ने जो पुस्तकें पिछले साल थीं, वे बदल दीं। शहर के कई बड़े स्कूल भी इस खेल में शामिल हैं।
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क्या करें भाई साहब, बच्चे तो पढ़ाने हैं : पिहोवा चौक के निकट एक दुकान से पुस्तकें खरीदने गए अभिभावक रमेश कुमार ने कहा कि भाई साहब बच्चे तो पढ़ाने हैं। उनके पूरे परिवार से 4 बच्चे पढ़ रहे हैं। सभी के लिए पुस्तकें खरीदी हैं। 8 से 10 हजार रुपये खर्च हुए हैं। मैंने पुस्तक विक्रेता से ही पूछा तो उसने बताया कि यदि यही पुस्तकें एनसीईआरटी से खरीदी जाएं तो 4 से 5 हजार रुपये में आ जातीं।
इसी प्रकार से राजेंद्र कुमार ने कहा कि उनके व उनके भाई के 5 बच्चे पढ़ रहे हैं। पुस्तकों का ही 14 से 15 हजार रुपये है। जबकि दाखिले का बोझ तो इससे अलग है। सरकार को पुस्तकों को लेकर कोई न कोई गाइड लाइन बनानी चाहिए।
इन सबके बीच बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना किए अभिभावक पुस्तकों की दुकानों पर लाचार खड़ा लुट रहा है।
प्रकाशक भी कर रहे हैं स्कूल संचालकों के साथ चालाकी, वर्कशीट जोड़ी जा रही है किताबों में, ताकि दूसरा बच्चा न कर सके उपयोग : कमीशनखोरी के चक्कर में कई प्रकाशक भी चालाकी कर रहे हैं। वे ऐसी पुस्तकें तैयार कर रहे हैं, जिसमेें वर्कशीट जोड़ी जा रही है। इसमें बच्चा एक साल में लिख देता है। जिसे दूसरा बच्चा प्रयोग ही नहीं कर पाता। इस खेल में अभिभावक पिस रहे हैं।

निजी स्कूल संचालक एसोसिएशन के प्रधान राजेश मुंजाल 6 से 12वीं तक सभी स्कूलों में एनसीईआरटी की पुस्तकें लगवाई जा रही हैं। सरकार जिसे प्राथमिकता देगी, उसके अनुसार ही स्कूल संचालक काम करेंगे। जो नहीं लगवा रहे, उनसे भी बात की जाएगी कि वे एनसीईआरटी की पुस्तकें ही लगवाएं।
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सरकार द्वारा जो प्रस्तावित पाठ्यक्रम व पुस्तकें हैं, स्कूल उन्हें फॉलो करें। अनावश्यक पुस्तकें अभिभावकों पर थोपी न जाएं। इसमें पता करवाया जाएगा कि कोई अनियमितता है तो संबंधित स्कूल संचालकों को निर्देश दिए जाएंगे। सरकार ने एनसीईआरटी की पुस्तकों को प्राथमिकता देने संबंधी निर्देश जारी किए हुए हैं।
जोगेंद्र हुड्डा, डीईओ
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