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खुली चल रही है किताबों के नाम पर हर साल होने वाली लूट..

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स्कूलों ने इस सत्र में भी बदलीं किताबें, जांच शुरू
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अभिभावकों ने दी डीसी को शिकायत, अभिभावकों की शिकायत पर डीईओ कार्यालय ने शुरू की जांच
फोटो संख्या-25 व 26
नसीब सैनी
कैथल। दाखिले के समय हर साल होने वाली किताबों के नाम पर लूट इस बार भी जारी है। कई स्कूल संचालकों ने हर साल की तरह इस बार भी आठवीं तक की किताबें बदल दी हैं। कहने को किताबें अपग्रेड की गई हैं ताकि बच्चों को ज्ञान ज्यादा मिल सके। लेकिन इसके पीछे कमीशन का बड़ा खेल चल रहा है। पुस्तक विक्रेताओं से कई स्कूल संचालकों ने हर बार की तरह से मोटी डील की है। मजबूरी में अभिभावकों को बदली हुई पुस्तकें खरीदनी पड़ रही हैं। इस तरह के कई आरोप लगाते हुए अभिभावकों ने कैथल डीसी से जांच की मांग की। डीसी के आदेशों पर डीईओ कार्यालय ने जांच शुरू कर दी है।
हर साल क्यों बदल दी जाती हैं किताबें
शहर में अभिभावकों ने डीसी को शिकायत दी है कि जिले के निजी स्कूलों में हर साल आठवीं तक प्रकाशक व लेखक बदल दिए जाते हैं। ताकि अभिभावकों को मजबूरन नई किताबें खरीदनी पड़ें और उन्हें मोटा कमीशन मिल सके। इस बार भी जिले में अधिकतर निजी स्कूलों ने किताबें बदल दी हैं।
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कुछेक को छोड़कर लगभग सभी स्कूल बदल रहे हैं किताबें
शहर से मिली जानकारी के अनुसार डीएवी, हिंदू कन्या स्कूल सहित कुछेक ऐसे स्कूल हैं, जो किताबें नहीं बदलते। इसके अलावा लगभग सभी निजी स्कूल किताबें बदल देते हैं। इसका खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ता है। यदि किताबें न बदलें तो कई बच्चे पुरानी किताबों से भी अपना काम चला सकते हैं।

हर साल क्यों बदलते हैं प्रकाशक व लेखक
अभिभावक देवेंद्र ने बताया कि अधिकतर स्कूल संचालक आठवीं तक ही किताबें बदल रहे हैं। क्योंकि इस कक्षा तक एनसीईआरटी की किताबें काफी कम मिल पाती हैं। इसी बात का फायदा स्कूल संचालक व पुस्तक विक्रेता व पुस्तक प्रकाशक उठा रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या हर साल प्रकाशक व लेखक बदलने से बच्चों का बौद्धिक ज्ञान कई गुणा ज्यादा बढ़ जाता है? या फिर यह महज कमीशन का खेल है। जो सरकार द्वारा आंखें बंद किए जाने के कारण स्कूल संचालक व पुस्तक विक्रेता हर साल खेलते आ रहे हैं।
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एक ही पुस्तक विक्रेता से करवाई जा रही है खरीद
नई किताबें बदलने के बाद स्कूल संचालक किसी पुस्तक विक्रेता से सांठ-गांठ कर लेते हैं और स्कूल में दाखिला लेने वाले अभिभावकों को उस स्कूल का विजटिंग कार्ड थमा देते हैं और सीधा कहा जाता है कि आप वहां से किताबें खरीद लीजिएगा। जहां पुस्तक विक्रेता पहले से ही तय सौदे के अनुसार मनमानी कीमतों पर अभिभावकों को पुस्तक देते हैं। इस कीमत में पुस्तक प्रकाशक व लेखक को दी जाने वाली कीमत के अलावा पुस्तक विक्रेता का लाभ सहित स्कूल संचालक को दिया जाने वाला कमीशन भी शामिल रहता है। एक पुस्तक विक्रेता ने बताया कि वे मामूली लाभ पर यह काम कर रहे हैं। अधिकतर लाभ तो स्कूल संचालक व पुस्तक प्रकाशक उठा रहे हैं। वे तो बस एक कड़ी भर हैं। क्योंकि स्कूल संचालक स्कूलों में पुस्तकों का स्टॉल नहीं लगा सकते।
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