फसल अवशेष न जलाने के अभियान, पराली की गांठें तैयार कर रहे हैं किसान
कई जगह प्रयोग हो सकते हैं अवशेष
फोटो संख्या-20
अमर उजाला ब्यूरो
कैथल। जिले में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के माध्यम से स्थापित किए गए कस्टम हायरिंग सेंटरों व व्यक्तिगत तौर पर किसानों द्वारा भी अनुदान पर फसल अवशेष प्रबंधन खरीदे गए हैं। कृषि उपनिदेशक डॉ. महावीर सिंह ने बताया कि जिला में पराली की गांठें बनाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले 9 बेलर कृषि यंत्र हैं, जिनसे किसान अपनी धान की फसल के अवशेषों का सही तरीके से प्रबंधन कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि हरिपुरा गांव के अतिरिक्त खुराना व अन्य गांवों में ऐसी ही पराली की गांठे देखी जा सकती हैं, जो पेपर मिल को भेजने के लिए रखी गई है। हरिपुरा गांव में लगभग 80 एकड़ भूमि में धान की फसल के अवशेषों से पराली की गांठें तैयार की गई हैं। एक एकड़ में 40 क्विंटल तक पराली की गांठे बनाई जाती है। बेलर द्वारा 20 मिनट में एक एकड़ं धान की फसल की पराली की गांठें तैयार की जा रही हैं। बेलर द्वारा 15 किलो से लेकर 60 किलो तक पराली की गांठें बनाई जाती है। सरकार के प्रयासों का परिणाम है कि किसान अपनी भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने तथा पर्यावरण को प्रदूषण से बचाए रखने के लिए प्रति एकड़ एक हजार रुपये तक कृषि यंत्र मालिक को देने में कोई परहेज नहीं कर रहे हैं। करनाल के रायसन निवासी शमशेर ने बताया कि वे बेलर पर कार्य कर रहे हैं तथा पेपर मिल द्वारा 140 रुपये प्रति क्विंटल की दर से यह गांठे खरीदी जाती हैं, जो पिहोवा स्थित पेपर मिल को भेजी जाएंगी। सीवन के सरपंच प्रतिनिधि अमरेंद्र खारा व गज्जन सिंह सरपंच ने बताया कि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से किसान पराली न जलाने बारे जागरूक हुए हैं।