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शब्द ही हमारे कर्म होते है : अशोक शर्मा

Sat, 10 Jan 2026 12:27 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
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09जेएनडी06 : पुजारी अशोक शर्मा।
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जींद। महाराजा अग्रसेन मंदिर पुजारी अशोक शर्मा ने कहा कि शब्द भी हमारे कर्म होते हैं। हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले तौलना बहुत जरूरी होता है नहीं तो उसके दुष्परिणाम स्वयं को ही नहीं अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं। संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसका जहर उसके दांतों में नहीं, शब्दों में होता है। इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।
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शर्मा ने एक कथा के माध्यम से बताया कि हस्तिनापुर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था। पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ते थे। अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबको महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी। तभी श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं। द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं। थोड़ी देर में उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं। द्रौपदी यह क्या हो गया ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था। द्रौपदी कहती हैं सखा तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए। भगवान कृष्ण कहते हैनहीं द्रौपदी मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूे।
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हमारे कर्मों के परिणाम को हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं तो हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता। द्रौपदी बोली तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूं कृष्ण। भगवान कृष्ण कहते है नहीं, द्रौपदी तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती। द्रौपदी बोली मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण कहते है तुम बहुत कुछ कर सकती थी, जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती तो, शायद परिणाम कुछ और होते। इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पांच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया। तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते और उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया कहा कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं। वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता तब भी शायद, परिस्थितियां कुछ और होती।
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