आज भी है निडाना में पानी की भारी किल्लत
अमर उजाला ब्यूरो
गांव के पूर्व सरपंच रतन सिंह मलिक गांव में पानी की स्थिति यूं समझाते हैं। गांव में लोगों ने अपने स्तर पर 12 ट्यूबवेल लगा रखे हैं। इनकी शुरुआत करीब दस साल पहले हो चुकी है। दस साल पहले ही सरकार पेयजल व्यवस्था को फेल मानते हुए लोगों ने कम्यूनिटी ट्यूबवेल लगाने शुरू कर दिए थे। पूर्व सरपंच रतन सिंह पूरी घटना के पीछे प्रशासन और सरकार की ही असफलता मानते हैं। ग्रामीणों द्वारा अपने स्तर पर लगाए गए ट्यूबवेल में से अधिकतर का पानी बहुत खराब हो चुका है और इन ट्यूवबेल को दूसरी जगह लगाने का विकल्प भी नहीं है और यह बहुत महंगा भी है। जहां घटना हुई है, इस बस्ती का भी अलग से ट्यूबवेल है, लेकिन पानी ऐसा है कि पशु भी नहीं पीएं। ऐसे में दलित बस्ती की महिलाएं दूसरे ट्यूबवेल के कनेक्शन वाले घरों से पानी लाती हैं। ये महिलाएं दिन भर बर्तन उठाएं घूमती रहती हैं।
बुजुर्गों की मान लेते तो बच जाती जान
ग्रामीणों के अनुसार रविवार को जिस समय युवा कुएं को साफ करने की योजना बना रहे थे, परिवार के ही बुजुर्गों ने ऐसा नहीं करने का सुझाव दिया था। ग्रामीणों यह भी चेताया था कि कुएं के पास मत जाना, यह काफी समय से बंद पड़ा है और यहां खतरा हो सकता है, लेकिन पानी की कमी के कारण युवा बुजुर्गों की इस सलाह को दरकिनार कर कुएं की सफाई करने पहुंच गए।
11 एकड़ में जलघर, बूंद-बूंद को तरसता गांव
दरअसल करीब 25 साल पहले गांव की पंचायत जन स्वास्थ्य विभाग को 11 एकड़ जमीन देकर जलघर का निर्माण करवाया था। गांव में बने जलघर से निडाना, ढिगाना, निडानी और भैरोखेड़ा गांवों कों पेजल की सप्लाई होनी थी, लेकिन जलघर एक गांव की प्यास भी नहीं बुझा पा रहा है। ऐसा नहीं है कि जन स्वास्थ्य विभाग इस ओर ध्यान नहीं देर रहा है। गांव के पूर्व सरपंच राम भगत महिल के अनुसार तीन साल पहले गांव के जलघर के रखरखाव पर 25 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन ऐसा कोई काम नहीं हुआ, जिससे नहरी पानी जलघर तक पहुंच सके। ऐसे में चार गांवों की प्यास बुझाने के लिए बनाया गया जलघर अब सिर्फ गांव की जमीन पर कब्जा करने के बराबर है। गांव में पिछले करीब दस साल से नहरी पानी की सप्लाई नहीं हुई है। अब ग्रामीण उन 25 लाख रुपये का हिसाब मांग रहे हैं, जो जलघर की मुरम्मत पर खर्च हुए हैं।
खेत बन गया है जलघर का टैंक
गांव के जलघर में दो बड़े टैंक हैं। एक टैंक में तो पिछले दस साल से पानी नहीं आया है। एक टैंक में नहरी पानी आता है, लेकिन यह सप्लाई नहीं होता। टैंक का बेड पूरी तरह टूट चुका है और यह पानी जमीन में ही चला जाता है। ग्रामीणों के अनुसार जलघर के लिए बनाई गई नाली से बहुत कम पानी जलघर में पहुंचता है। अधिकतर पानी रास्ते में ही बह जाता है। एक सप्ताह पहले ही गांव के रजवाहे में पानी आया और डीसी ने आदेश भी दिए हैं कि पहले जलघर में पानी पहुंचाओ तो भी जलघर का टैंक खेत में तब्दील हो गया है। दिन के समय यहां महिलाएं चारा काटती हैं।
परिवारों पर टूटा दुख का पहाड़
घटना से हालांकि पूरा गांव शोक में डूबा है, लेकिन मृतकों के परिवारों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। घटना में जान गंवाने वाला महिला अपने परिवार का अकेला कमाने वाला था। महिपाल के चार बच्चे हैं, पत्नी और बूढ़ी मां। इस परिवार पर जीवन यापन का संकट खड़ा हो गया है। वहीं दिनेश की शादी करीब डेढ़ साल पहले हुई थी। फिलहाल दिनेश की पत्नी आठ माह की गर्भवती है और यही दिनेश की निशानी है। वहीं मृतक संजय के घर में मां-बाप के अलावा पत्नी और दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी चार साल की और छोटी बेटी एक साल की है।
सामूहिक मातमपुरसी
घटना से सहमे परिवारों ने अलग-अलग मातमपुरसी करने की बजाए अनुसूचिजाति की चौपाल में ही स्थान तय किया है। शोक जताने वाले लोग यहीं आते हैं। घटना के बाद मंगलवार को दूर दराज से रिश्तेदारी और समाज के लोग शोक जताने पहुंचे। कुछ लोग सिर्फ समाचार पढ़कर ही शोक जताने पहुंचे।