जींद। नागरिक अस्पताल में शनिवार को राष्ट्रीय एकीकृत स्वास्थ्य पशुजन्य रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सिविल सर्जन डाॅ. गोपाल गोयल ने की, जबकि डिप्टी एमएस डाॅ. राजेश भोला, डाॅ. रवि राणा ने लोगों को रेबीज के बारे में जानकारी दी।
डाॅ. राजेश भोला ने कहा कि रेबीज एक घातक बीमारी है। रेबीज एक ऐसा वायरस है, जो ज्यादातर केस में मौत का कारण बनता है। आमतौर पर रेबीज को कुत्तों से जोड़ कर देखा जाता है, लेकिन यह सिर्फ कुत्तों के काटने से ही नहीं फैलता है, बल्कि इसके कुछ अन्य कारण भी होते हैं। रेबीज वायरस संक्रमित कुत्तों या अन्य जानवरों की लार में मौजूद होता है। इन जानवरों के काटने से फैलता है। अगर किसी व्यक्ति में एक बार रेबीज के लक्षण दिखने लगते हैं तो ज्यादातर मामलों में यह मौत का कारण बन सकता है।
कुत्तों के अलावा बिल्ली, बीवर, गाय, बकरी, चमगादड़, रैकून, लोमड़ी, बंदर और कोयोट में भी रेबीज पाया जाता है। रेबीज से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि अपने पालतू जानवरों को टीका लगवाएं। आवारा कुत्तों से थोड़ी दूरी बनाए रखें। डाॅ. रवि राणा ने कहा कि रेबीज के लक्षण आमतौर पर जल्दी दिखाई नहीं देते। वायरस लक्षण पैदा करने से पहले शरीर के जरिये दिमाग तक पहुंचता है। इसके बाद ही लक्षण दिखाई देते हैं। रेबीज किसी व्यक्ति के शरीर में एक से तीन महीने तक निष्क्रिय रह सकता है। रेबीज के लक्षण की बात करें तो इसका सबसे पहला संकेत है बुखार आना। रेबीज में ध्यान देने योग्य जो बातें हैं उनमें घबराहट होना, पानी निगलने में दिक्कत होना या लिक्विड के सेवन से डर लगना, बुखार आना, तेज सिरदर्द होना, बुरे सपने और अत्यधिक लार आना, नींद न आना, पार्शियल पैरालिसिस शामिल है। इससे बचाव के लिए रेबीज का टेस्ट कराएं और साथ ही उस पशु का भी परीक्षण कराएं, जिसने व्यक्ति को काटा है। इसके अलावा रेबीज संक्रमित जानवर के काटने, उसके खरोचने या उसके लार के सीधे त्वचा के संपर्क में आने पर तुरंत रेबीज वैक्सीन लगवाएं। जंगली जानवरों से दूर रहें। चमगादड़ को अपने घर के आसपास न आने दें। अपने पालतू जानवर को रेबीज का टीका लगवाएं। इस मौके पर नरेश रोहिल्ला, मैट्रन इंद्रो व सुनीता मौजूद रहे।
28जेएनडी02 : रेबीज के बारे में लोगों को जागरूक करता अस्पताल का स्टाफ। संवाद