जींद। भारतीय न्याय संहिता को जिला बार के वकीलों ने पुलिस की शक्ति को बढ़ाने के रूप में लिया है। इसमें ज्यादा बदलाव न करके सिर्फ वकीलों को परेशान करना भी बताया गया। वकीलों ने बताया कि कुछ ही धाराओं में फेरबदल हुआ है, जबकि पुलिस की शक्तियों में ज्यादा बढ़ोतरी की गई है। अब अपराधी को हथकड़ी लगाने का फैसला खुद पुलिस को करना होगा। पहले अदालत से मंजूरी लेनी होती थी।
बार में वकील विनोद बंसल, कुलदीप गिल, विकास लोहान, सुरेश गोयल, संजय गोयत, सुशील शर्मा, सतीश गिल व पवन सिंगला ने बताया कि तीन से सात साल तक की सजा के मामलों में पुलिस को पहले जांच व बाद में एफआईआर दर्ज करने का अधिकार दिया गया है। इन गंभीर मामलों में पुलिस को 14 दिन जांच के नाम पर दिए गए हैं। इस समय के अंतराल में अपराधी बड़ी आपराधिक वारदात को आसानी से अंजाम दे सकता है। जिससे अपराधियों के हौंसले बुलंद होंगे। पुलिस को पहले रिमांड 15 दिन तक मिलता था। कई गंभीर मामलों में टुकड़ों में अलग-अलग दिन निर्धारित थे। जिसमें कुछ ज्यादा दिन भी मिलते थे, लेकिन अब अधिकतम 90 दिन रिमांड के लिए दिए गए हैं। ज्यादा लंबा रिमांड पर पुलिस का नाजायज लाभ उठाने का डर रहेगा। इसके अलावा महिला अपराधों में धारा 377 को खत्म किया गया है। इस तरह के मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं बची है। इन गंभीर मामलों में अब कोई अपनी आवाज नहीं उठा सकेगा। कई मामलों में बेहतर काम हुआ है। सामूहिक दुष्कर्म में फांसी का कानून बनाना अच्छा निर्णय है। सरकार को चाहिए था कि पुलिस के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाया जाए। पुलिस के पास डीएनए के सैंपल लेने के लिए लंबे समय से किटों की कमी बनी हुई है। जिसके चलते समय पर रिपोर्ट नहीं मिलती और अदालतों में फैसले लंबित रहते हैं। कु छ मामलों में फैसले सुनाने का समय निर्धारित किया है। देश में हर साल लंबित मामलों की संख्या बढ़ रही है। इसके लिए जज व अदालतों की कमी होती है। अगर निर्धारित समय में जल्दबाजी में फैसला सुनाया भी जाएगा तो इससे गलत निर्णय होने का डर ज्यादा रहेगा।
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यह हटाई गई धाराएं
124 ए राजद्रोह की धारा, 309 आत्महत्या का प्रयास, 377 अप्राकृतिक रूप से संभोग करना, 310 ठग, 311 ठग हेतु दंड व 497 व्यभिचार की धाराओं को खत्म किया गया है। इनके खत्म होने से कुछ पीड़ितों की न्याय की आस खत्म हुई है।