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Jind News: अब नजर नहीं आते पहले जैसे पकवान, देवर भाभी की शरारत भी हुई कम

Sat, 04 Mar 2023 09:43 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
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जींद। होली के त्योहार को लेकर लोगों में उत्साह तो जबर्दस्त है लेकिन समय के साथ साथ इसे मनाने के तौर तरीकों में भी बदलाव आने लगा है। पहले आठ से 10 दिन पहले सड़कों पर होली का हुडदंग शुरू हो जाता था। गलियों में बच्चे छतों से गुब्बारे और पानी की बौछार शुरू करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। पहले की तरह उतने पकवान भी नहीं बनते। देवर भाभी की वह शरारत भरी होली भी लुप्त सी हो रही है।
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दो दशक पूर्व इस त्योहार पर तरह तरह के पकवान घर पर बनाए जाते थे। सूजी का हलवा और खिलमा चावल का अपना ही मजा था। दही भल्ले और गोलगप्पे भी बनाए जाते थे। होली खेलने के बाद परिवार और शाम को आसपड़ोस के लोग भी साथ बैठकर इनका लुत्फ उठाते थे । लेकिन आज ये चीजें घर में कम ही बनने लगी हैं। हर व्यक्ति बाजार पर निर्भर है। घर में बनाने की बजाय बाजार से मिठाई लाकर खाई जाती है।
बडे़ बुजुर्ग कहते हैं कि पहले पर पूरा गांव खेल को बड़े प्यार से खेलता था। उस समय लोग रंग गुलाल कम काला तेज और कीचड़ अधिक डालते थे। महिला कपड़े फाड़कर उनसे ही मजाकिया अंदाज में उनकी पिटाई करती थी। देवर भाभी को रंग से भरे टब में डाल दिया करते थे। भाभी भी देवर पर कीचड़ और काला तेल डालकर अपनी चुन्नी से कोरड़े बरसाती थी। खूब शरारत करतीं थी लेकिन समय के साथ ये चीजें न के बराबर हो गई हैं।
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होली का बदला स्वरूप
आज के समय में होली व फाग का स्वरूप पुराने जमाने से बिल्कुल विपरित है। उस समय घर पर ही हलवा और खिलमा चावल का पकवान बनाया जाता था, अब भारतीय मिठाई की बजाय बाजार से ही मिठाई लाई जाती है। जिनमें घर जैसा स्वाद और प्यार नहीं होता।
-सुदेश कंडेला।

दिनभर होली व फाग का त्योहार मनाकर सायं के समय में गांव में युवाओं की कुश्ती भी करवाई जाती थी, ताकि गांव को पता लग सके की गांव में किसका लडक़ा सबसे ताकतवर है। कुश्ती का नजारा भी अलग होता था। इसके लिए भी गांव के युवा पहले से ही तैयारियां करने लग जाते थे।
-निहाल सिंह।


त्योहार पर कोई भी देवर व भाभी दिनभर होली खेलते थे तो परिवार व गांव में कोई इस बात का बुरा नहीं मानता था, लेकिन आज के समय में त्योहार सिमट कर केवल तिलक तक आ पहुंचा है। अब न तो महिलाएं ही खेल के लिए बाहर निकलती और न ही खेल को प्यार से खेला जाता।
-ओमपति देवी।
गांवों की बात हो या शहर की पुराने समय में लोग इस त्योहार को प्यार के त्योहार के रुप में मनाते थे, लेकिन अब समय बदल गया है। त्योहार के दिन लोग अच्छाई व बुराई का ध्यान न रखकर द्वेष रखते हैं। जिसके कारण लड़ाई झगड़े का भी डर रहता है। पुराने समय में होली व फाग के त्योहार का अलग ही नजारा व इंतजार होता था, जो लगभग सवा महीने तक चलता था।
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-रानी इंद्रजीत।
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