उचाना। पुरानी अनाज मंडी में स्थित तेरापंथ भवन में आचार्य महाश्रमण की शिष्या समणी जयंत प्रज्ञा, सन्मति प्रज्ञा के सान्निध्य धर्म सभा आयोजित हुई। उन्होंने कहा कि अगर जीवन में बनोंगे मुलायम तो प्रतिष्ठा होगी कायम। जो वस्तु चीज मुलायम होती है वो सभी को प्रिय लगती है जैसे रूई, मक्खन और फूल। कठोर वस्तु किसी को अच्छी नहीं लगती। जिंदगी में सदा अपने के लिए कठोर ओर दूसरों के लिए नरम बनो। उन्होंने कहा आप देखना कोमलता के अभाव में परिवार में शांति नहीं आ सकती।
जो इंसान कठोर होता है धीरे-धीरे उसी की बगावत होनी शुरू हो जाती है। स्वार्थ में भी इंसान कठोर बन जाता है। मोक्ष का अधिकारी भी वहीं है जो शांत है। संसार पार करना है तो मृदुता जरूरी है।
कोमल जमीन में ही अंकुर पैदा होता है। इसी प्रकार कोमलता में ही धर्म उत्पन्न होता है। एक सूख पत्ता ही शोर मचाता है वहीं एक हरा पत्ता कभी भी आवाज नहीं करता। ठीक इसी प्रकार ज्ञान पैदा होने के बाद हमें गंभीर बनना है।
उन्होंने कहा कि कठोर इंसान और वस्तु जल्दी समाप्त होती है। नरम इंसान और वस्तु लंबे समय तक चलते है। जैसे दांत जल्दी टूट कर गिर जाते हैं। जीभ अंतिम समय तक साथ निभाती है। आज परायों के साथ जीना जितना आसान वहीं घर परिवार के सदस्यों के साथ जीना उतना ही मुश्किल है। घर में जीने का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम ईंट, पत्थरए चूने से बने मकान में रहे।
घर के साथ जीने की पहली शर्त है कि हम अपने भीतर आत्मीयता, सहज स्नेह का विस्तार करें। जिस घर में तीन पीढियां एक साथ बैठकर भोजन और भजन करती है, ऐसा घर साक्षात स्वर्ग है। साधु चलता है तो भी संयम के कारण रूकता है। संयम के कारण चलना जरूरी है। बिना चले घूटने जाम हो जाएंगे। पाचनतंत्र भी खराब हो जाएगा। साधु चलता ज्यादा है रूकता कम है। चलने के आठ महीने पर रूकने के चार महीने। घर पर बैठे रहने से कभी लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता।