जींद। सूडान में चल रहे गृह युद्ध में फंसे अमन गुप्ता अपने परिवार सहित सकुशल जींद लौट आए हैं। वह वीरवार को जींद के रेलवे रोड स्थित अपने घर पहुंच गए। उनके घर पहुंचने पर उनके पिता वीरेंद्र गुप्ता और उनकी माता फूले नहीं समा रही हैं। आसपास के लोग भी परिवार से मिलने के लिए पहुंच रहे हैं। अमन गुप्ता ने अमर उजाला से बातचीत में सूडान के भयावह मंजर के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि सूडान में भारतीय नौसेना ने उनकी बहुत मदद की और उन्हें सूडान से बाहर निकाला। सूडान में गृह युद्ध हो जाएगा, किसी को भी इसका अंदेशा नहीं था। 15 अप्रैल सुबह नौ बजे ही बम के धमाके शुरू हो गए थे, जिनमें 40 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वह अपने कार्यालय मेगा स्टील सरिया फैक्टरी में पहुंच चुके थे। घर बात की तो उनकी पत्नी और ढाई साल की बिटिया बिल्कुल डरी हुई थी। उनको फोन पर संभाला और कहा कि वह सभी खिड़की और दरवाजों को बंद कर दें और बाहर न निकलें। किसी को भी अंदर न आने दें। शाम चार बजे वह गाड़ी लेकर कार्यालय से निकले तो चेक पोस्ट पर चार आरएसएफ जवानों ने उन्हें गाड़ी उतार लिया और गाड़ी की तलाशी ली। उन्होंने गाड़ी में जो मिला जब अपने कब्जे में ले लिया। गाड़ी में रखे बैग में उनके 4-5 हजार रुपये थे, लेकिन वह भी उन्होंने ले लिए थे। उन्होंने रात फैक्टरी में ही गुजारी, जहां 162 भारतीय लोग थे। खार्तूम में तीन जेलें तोड़ दी हैं और जेलों में बंद कैदी दुकानों तथा मकानों को लूट रहे हैं। अब वहां स्थिति बहुत ही भयानक बनी हुई है।
राशन की सप्लाई बंद, सिलिंडर भी हो गया था खत्म, न्यूडल्स खाकर पेट भरा
गृह युद्ध के दौरान खार्तूम शहर में सिर्फ धुआं ही धुआं ही उठ रहा था। घर का राशन और सिलिंडर भी खत्म हो चुका था। सप्लाई भी बंद हो गई थी। खाना-पीना सही नहीं मिलने से ढाई वर्षीय बेटी को बुखार होने लगा था। वह घर में रखी पैरासिटामोल दवा दे देते थे, क्योंकि बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। युद्ध की शुरुआत में तो पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम भाइयों ने रमजान पर उन्हें इफ्तार कराया, लेकिन दो-तीन दिन बाद माहौल और ज्यादा खराब होने पर बाहर निकलना बंद हो गया। राशन की चिंता सताने लगी और उन्होंने दो दिन नमकीन, न्यूडल्स खाकर अपना पेट भरा।
पोर्ट सूडान तक जाने के लिए 4 लाख में मिली बस
सूडान की राजधानी खार्तूम में भयावह माहौल से निकलने को हर कोई तैयार नहीं था। सभी बोल रहे थे कि यहां से गए तो मार दिए जाओगे, लेकिन वहां से तीन परिवार ही पोर्ट सूडान जाने के लिए तैयार हुए। वहां भारतीय दूतावास ने कोई बस नहीं भेजी तो उन्होंने एक बस का प्रबंध किया, जिन्होंने पोर्ट सूडान जाने के लिए चार लाख रुपये लिए। वह 14 घंटों में पोर्ट सूडान पहुंचे, जहां पर भारतीय नागरिकों ने उन्हें खाने-पीने को दिया।
गुजराती परिवार ने दिखाई इंसानियत
100 साल से पोर्ट सूडान में बसे गुजराती परिवार ने भारतीय नागरिकों के बचाव को लेकर इंसानियत दिखाई। उन्होंने अपने खर्चे पर बसें भेजीं और भारतीय नागरिकों को अपने घर तथा एक स्कूल में ठहराया। उन्होंने खाना खिलाया और उनको सुरक्षित रखा। गुजरात के रहने वाले मिलन पारेख का भाई अमित पारेख भी खार्तूम में फंस गया था। उन्होंने भारतीय परिवारों को लाने के लिए खार्तूम से कई बसें भेजीं।